नई दिल्ली: माओवाद, जो कभी सामाजिक बदलाव का नारा था, आज आतंक और अवैध वसूली का पर्याय बन चुका है। यह विचारधारा नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है, जो डर और हिंसा के बल पर समाज को बंधक बनाता है। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र नाथ राय की यह विशेष रिपोर्ट माओवादी हिंसा के खूनी इतिहास और इसके खिलाफ भारत की लड़ाई को बयां करती है। 2000 से मार्च 2025 तक माओवादी हिंसा में 11,794 भारतीय अपनी जान गंवा चुके हैं। चाहे पथभ्रष्ट माओवादी हों या राष्ट्र की रक्षा करने वाले जवान, इस हिंसा ने देश के अपने ही लोगों को निगल लिया। इसमें 20 मार्च को बीजापुर हुई मुठभेड़ में मारे गये माओवादियों की संख्या जोड़ दें तो यह आंकड़ा 11794 तक पहुंच गया।
माओवादी देश के लिए नासूर हैं
माओवादी ऐसे भारतीय हैं, जो भारतीय होते हुए भी विदेशी आंतकवादियों से ज्यादा देश के लिए नासूर हैं। ये भोले भाले लोगों का ब्रेन वाश करते हैं फिर उन्हें हथियार उठाने की सलाह देते हैं। युद्ध क्षेत्र में लड़ने के लिए अशिक्षित लोगों को तैयार करते हैं, लेकिन शिक्षित लोग ऊंच पदों पर बैठकर मलाई काटते हैं अर्थात जो अवैध वसूली का पैसा आता है, उसका अधिकांश हिस्सा अपने ऐशो आराम में व्यय करते हैं।
अब तक देश में 5547 माओवादी घटनाएं हो चुकी हैं
यदि एम.एच.ए. के डाटा के अनुसार इन मौतों पर गौर करें तो देशभर में वर्ष 2000 से मार्च 2025 तक हुई कुल 5547 मुठभेड़ अथवा माओवादी घटनाओं में 4742 नक्सली मारे जा चुके हैं। वहीं 2704 सुरक्षा व्यवस्था में लगे जवानों ने शहादत दी है, जबकि 4096 आम जन को माओवादियों ने मार दिया है। इन मुठभेड़ों में अब तक 252 ऐसे लोगों की भी मौत हुए है, जिनकी पहचान ही नहीं हो सकी।
सबसे ज्यादा मौत हुई थी 2010 में
यदि कुल मौतों के डाटा के हिसाब से देखें तो देश में नक्सल के कारण सबसे ज्यादा 2010 में 1180 मौतें हुई थीं। उस वर्ष कुल 481 नक्सली घटनाएं अथवा मुठभेड़ हुए थे, जिसमें 265 नक्सली मारे गये थे, वहीं 267 जवानों ने शहादत दी थी। 630 आमजन मारे गये थे। 18 लोग ऐसे मारे गये थे, जिनकी आज तक पहचान नहीं हो सकी।
इस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स पर किया था हमला
यह वही साल था, जब 15 फरवरी को पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर जिले के सिलदा में इस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के शिविरों माओवादियों ने हमला कर दिया था। उसमें 24 जवान शहीद हो गये थे। इसी वर्ष चार अप्रैल 2010 को उड़ीसा के कोरापुट जिले में माओवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर नक्सल विरोधी विशेष अभियान दल के 11 सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली। 6 अप्रैल को दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों के हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 जवान और छत्तीसगढ़ पुलिस के एक अधिकारी मारे गये।
2009 में माओवादियों ने ट्रेन कर लिया था हाईजैक
इसके बाद सिर्फ 2009 ऐसा वर्ष रहा, जिस वर्ष कुल मौतें 1000 से ज्यादा रहीं। इस वर्ष कुल 1013 मौतें हुए, लेकिन इसमें नक्सलियों की मौत और जवानों की शहादत की संख्या बढ़ गयी, जबकि आमजन के मौत की संख्या 2010 की अपेक्षा आधी रह गयी अर्थात इस वर्ष मुठभेड़ की घटनाएं जबरदस्त रही। इस वर्ष 407 मुठभेड़ अथवा घटनाएं हुईं, जिसमें 2010 में हुए 630 आमजन की मौत की अपेक्षा इस वर्ष 368 रह गयी। वहीं जवानों की शहादत 267 से बढ़कर 319 हो गयी, जबकि 2010 में 265 नक्सली मारे गये, वहीं इस वर्ष यह संख्या बढ़कर 314 पहुंच गयी। वहीं 12 ऐसे लोग मारे गये, जिनकी पहचान नहीं हो सकी। यह वहीं वर्ष था, जब महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में हुए एक बड़े नक्सली हमले में 15 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गये। यह वहीं समय था, जब एक वर्ष में माओवादियों ने एक साल में ट्रेन हाईजैक की तीन घटनाओं को अंजाम दिया। 22 अप्रैल माओवादियों के एक दल ने कम से कम 300 लोगों से भरी एक पैसेंजर ट्रेन को हाईजैक कर लिया। इसके बाद वे ट्रेन को झारखंड के लातेहार जिले में ले गए, लेकिन बाद में उन्हें भागना पड़ा। वहीं 27 अक्टूबर को हुई थी।
राजधानी ट्रेन को रोक लिया था
नक्सलियों ने पश्चिम मिदनापुर जिले के बांस्तला रेलवे स्टेशन पर नई दिल्ली जाने वाली भुवनेश्वर राजधानी एक्सप्रेस को रोक लिया था। लगभग 300-400 नक्सली समर्थकों ने इस अपहरण को अंजाम दिया था। उनकी मांग थी कि उनके नेता छत्रधर महतो को रिहा किया जाए। उस समय की रेलमंत्री ममता बनर्जी माओवादियों के मांगों के आगे नहीं झुकीं और माओवादियों को भागना पड़ा। 23 जून 2009 को बिहार के लखीसराय जिला न्यायालय परिसर में मोटरसाइकिल सवार हथियारबंद नक्सलियों के एक समूह ने गोलीबारी की। उन्होंने रांची के नक्सली समूह के जोनल कमांडर सहित अपने चार साथियों को छुड़ा लिया।
2006 में सबसे ज्यादा माओवादी मारे गये
यदि सन 2000 से लेकर मार्च 2025 तक सबसे ज्यादा माओवादियों की मौत का डाटा देखें तो वह वर्ष था 2006, जिस वर्ष कुल 343 माओवादी मारे गये थे। इस वर्ष कुल मौत का डाटा 734 है। इस वर्ष जवानों की शहादत 128 थी। वहीं आमजन की मौत 249 रही। वहीं इन 25 वर्षों में सबसे ज्यादा जवानों की शहादत 2009 में 319 रही। आमजन की सबसे ज्यादा मौत इन 25 वर्षों में 2010 में 630 रही, जबकि सबसे कम जवानों ने शहादत देकर ज्यादा संख्या में माओवादियों को मारने काम 2024 में किया।
इस वर्ष 300 से ज्यादा माओवादी मारे गये
इस वर्ष कुल 180 माओवादी घटनाएं अथवा मुठभेड़ हुए, जिसमें लगभग 85 आमजन की मौत हुई। 24 जवानों ने शहादत दी और 300 से ज्यादा माओवादियों को मार गिराया। इसमें भी विशेषता रही कि इस वर्ष मुठभेड़ में दर्जन भर से अधिक उच्च पदों पर बैठे माओवादी मारे गये। इससे पहले उच्च पदों पर बैठे माओवादियों को मारना पुलिस के लिए टेढ़ी खिर थी। सिर्फ सिपाही या एलओएस स्तर के ही ज्यादातर माओवादी मारे जाते थे।
सबसे कम जवानों की शहादत हुई थी 2022 में
वहीं सबसे कम जवानों की शहादत की दृष्टि से देखें तो वह वर्ष था 2022, जब 15 जवान शहीद हुए थे। इस वर्ष भी अब तक 12 जवान शहीद हुए हैं, लेकिन मार्च तक के आंकड़े से पूरे वर्ष का आंकलन करना ठीक नहीं होगा। 2022 में नक्सलियों की भी मौत की संख्या मात्र 67 थी। यानि दोनों तरफ शांति सा माहौल था। सन 2000 से अब तक सबसे कम नक्सली 2023 में मारे गये, जो 2022 के 67 मारे से 11 कम था अर्थात 56 माओवादी मारे गये थे। 2025 में तो अभी तक ही 131 माओवादी मारे जा चुके हैं। सरकार ने मार्च 2026 तक भारत से माओवादियों को समाप्त करने की घोषणा कर रखी है। इस हिसाब से दिसम्बर तक यदि 1000 माओवादियों के मारे जाने की सूची आ जाय तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
कांकेर के वरिष्ठ पत्रकार ने कहा
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार और कांकेर में एक अखबार के ब्यूरोचीफ राजेश शर्मा का कहना है कि अब तक के इतिहास में माओवादियों सबसे ज्यादा भय वर्तमान में देखने मिल रहा है। कितने मारे गये, यह मायने नहीं रखता, कितना उनमें दहशत है, यह ज्यादा मायने रखता है। वर्तमान में स्थिति यह है कि माओवादी उप्र में योगी सरकार बनने के बाद जैसे गुंडे गले में आत्मसर्पण का लोगो लगाकर थाने सरेंडर करने जाने लगे थे। कुछ ऐसी ही स्थिति माओवादी क्षेत्रों में हो रही।
सतीश श्रीवास्तव ने कहा
वहीं रायपुर के एक अखबार के संपादक, वरिष्ठ पत्रकार सतीश श्रीवास्तव का कहना है कि माओवादी अब पलायन की ओर हैं। अब सरकार को चाहिए कि माओवादी क्षेत्रों में अधिकतम विकास करे, जिससे उन क्षेत्रों में शिक्षा के विकास के साथ चतुर्दिक विकास दिखें, जिससे जनता आसानी से समझ सके कि पहले कितने अविकसित थे और माओवादियों के पलायन के बाद वे किस तरह से देश और प्रदेश के साथ विकास की गति में तालमेल बैठा पा रहे हैं।
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स्पेशल सेल के डीआईजी ने कहा
स्पेशल सेल के डीआईजी एम.एल कोटवानी बताते हैं कि अभी कुछ दिन पूर्व बस्तर संभाग के युवा रायपुर टहलने आये थे। यह योजना सरकार ने चला रखी है। वे ऐसे युवा थे, जो 25 साल या उससे ऊपर के हो चुके थे, लेकिन अब तक अपने जिले से बाहर की दुनिया नहीं देखी थी। वे बहुत ही भावुक थे। वे महसूस भी कर रहे थे कि हम माओवादियों के कारण कितने पिछड़े हैं, यह निश्चित है कि जैसे-जैसे माओवादी अपनी अंतिम सांसे गिन रहे होंगे, वैसे-वैसे इन क्षेत्रों में विकास की नई इबारत लिखी जा रही होगी।



