नई दिल्ली: पेट्रोल-इथेनॉल ब्लेंडिंग के उपयोग से गाड़ियों के खराब होने की खबरों के बीच नितिन गडकरी का बयान चर्चा का केंद्र बना हुआ है। नितिन गडकरी ने माना है कि डीजल-एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के असफल हो जाने के बाद ARAI अब डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने पर काम कर रही है। हालांकि गडकरी जी ने ऑटोमोबाईल लाबी पर दवाब बनाने के आरोप भी लगाए, लेकिन इन सब के बीच सरकार ने e-20 अर्थात पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य पूरा कर लिया है। चूंकि भारत में अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाईल उद्योग भी है, ऐसे में बायोफ्यूल का सतत उपयोग भविष्य के लिए कई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
क्यों है बायो फ्यूल की जरूरत
एक स्टडी के मुताबिक 2024 में कोयला, पेट्रोल जैसे जीवाश्म ईंधनों का वैश्विक ऊर्जा खपत में हिस्सा 80% से अधिक रहा। ऐसे में बायोफ्यूल पर्यावरण के लिए अच्छा विकल्प है। अगर अर्थव्यवस्था के लिहाज से बात करें तो इथेनॉल अथवा आइसोब्यूटेनॉल को पेट्रोल अथवा डीजल में मिलाने से कच्चे तेल की जरूरत कम होगी और भारत आत्मनिर्भर बनेगा।
चूंकि बायोफ्यूल (जैव-ईंधन) का उत्पादन गन्ना, मक्का जैसी फसलों से भी होता है, ऐसे में किसानों की भी आय बढ़ती है। एक अनुमान के अनुसार एथेनॉल उत्पादन में मक्के के उपयोग से किसानों को 42,000 करोड़ से अधिक का फायदा हुआ।
क्या है बायोफ्यूल
बायोफ्यूल (जैव-ईंधन) एक तरह का नवीकरणीय ऊर्जा ईंधन है। यह बायोमास और जैविक अपशिष्ट जैसे जैविक स्रोतों से प्राप्त होता है। इसे मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: लिक्विड बायोफ्यूल (इथेनॉल, बायोडीजल, बायो-मेथनॉल आदि), बायोगैस (Bio-LNG, Bio-CNG आदि) और ठोस बायोमास। इसके अलावा बायोफ्यूल को चार पीढ़ियों में बांटा जाता है
पहली पीढ़ी के बायोफ्यूल: इन्हें पारंपरिक तकनीक का उपयोग करके चीनी, स्टार्च, वनस्पति तेल या पशु वसा जैसे खाद्य स्रोतों से बनाया जाता है। प्रथम पीढ़ी के जैव ईंधनों में बायोडीजल, वनस्पति तेल, बायोगैस आदि शामिल हैं।
दूसरी पीढ़ी के बायोफ्यूल: ये बायोफ्यूल तने, भूसी, लकड़ी के टुकड़े, तथा फलों के छिलके से बनाया जाता है। इसमें सेल्यूलोज इथेनॉल, बायोडीजल शामिल हैं।
तीसरी पीढ़ी के बायोफ्यूल: ये शैवाल जैसे सूक्ष्म जीवों से बनाया जाता हैं। उदाहरण के लिए ब्यूटेनॉल
चौथी पीढ़ी के बायोफ्यूल: उच्च मात्रा में कार्बन को अवशोषित करने के लिए आनुवंशिक रूप से इंजीनियर की गई फसलों का उपयोग करके इस जैव ईंधन का उत्पादन किया जाता है।

क्या है इथेनॉल
इथेनॉल जिसे एथिल अल्कोहल भी कहा जाता है, गन्ना, मक्का, चावल, गेहूँ और बायोमास जैसे विभिन्न स्रोतों से मिलने वाला जैव ईंधन है। इथेनॉल बनाने के लिए खमीर द्वारा या एथिलीन हाइड्रेशन जैसी पेट्रोकेमिकल प्रक्रियाओं के माध्यम से शर्करा का किण्वन किया जाता है। इथेनॉल 99.9% शुद्ध अल्कोहल है जिसे स्वच्छ ईंधन विकल्प बनाने के लिये पेट्रोल के साथ मिश्रित किया जाता है।
क्या है आइसोब्यूटेनॉल
आइसोब्यूटेनॉल का इस्तेमाल अब तक पैंट और कोटिंग इंडस्ट्री में होता रहा है। यह एक हाई अल्कोहल वाला बायोफ्यूल है, जो कृषि अवशेषों से प्राप्त होता है। इथेनॉल की तुलना में, आइसोब्यूटेनॉल की एनर्जी डेन्सिटी ज्यादा होती है जिससे यह मौजूदा डीजल इंजनों के साथ अधिक कारगर है।
बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई मुख्य पहलें
नए आंकड़ों के हिसाब से भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बायोफ्यूल उत्पादक देश हैं। भारत में बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के लिए की तरह की योजनाएं बनाई गई हैं। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति, 2018, प्रधान मंत्री जी-वन (JI-VAN) योजना, गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन (गोबरधन/ GOBAR-Dhan) योजना , सस्टेनेबल अल्टरनेटिव टूवर्ड्स अफोर्डेबल ट्रांसपोर्टेशन (SATAT) जैसी योजनाएं भारत में बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई हैं।
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बायोफ्यूल पर निर्भर हो रही दुनिया
संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील और भारत जैसे देश वैश्विक बायोफ्यूल बनाने में सबसे आगे हैं। भारत में जैव-एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम और बायो-डीजल पहलें तेजी से बढ़ रही हैं। कई देशों के पॉलिसी मेकर अब बायोफ्यूल को अपनी नैशनल एनर्जी प्लैनिंग में प्राथमिकता दे रहे हैं।
बायोफ्यूल भविष्य में क्लीन एनर्जी का एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है, बशर्ते इसके लिए लोगों में जागरूकता के साथ, सही पॉलिसी, रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट होता रहे।



