नई दिल्ली: हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को इस गंभीर मुद्दे के प्रति जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनियाभर में हर साल लगभग 7 लाख लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गंवाते हैं। यह आंकड़ा आत्महत्या को मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बनाता है। खासकर 15 से 29 वर्ष के युवा इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां आत्महत्या की दर वैश्विक औसत से अधिक है। यह एक सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आत्महत्या के पीछे क्या है कारण?
आत्महत्या के पीछे कई जटिल कारण होते है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे अवसाद (डिप्रेशन), चिंता और नशे की लत प्रमुख भूमिका निभाते है। इसके अलावा, आर्थिक तंगी, रिश्तों में तनाव, अकेलापन और गंभीर शारीरिक बीमारियां भी लोगों को इस कदम की ओर धकेल सकती है। युवाओं में पढ़ाई, करियर और सामाजिक दबाव, खासकर सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव और नशे की आदत, आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाते हैं। ये कारक मिलकर व्यक्ति को निराशा और हताशा की ओर ले जाते हैं।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
अगर कोई व्यक्ति अचानक व्यवहार में बदलाव दिखाए, जैसे चिड़चिड़ापन, गुस्सा, या सामाजिक दूरी बनाना, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है। बार-बार निराशा जताना, मृत्यु या आत्महत्या की बातें करना, जोखिम भरे व्यवहार में शामिल होना, या नशे की आदत बढ़ना भी खतरे की घंटी है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत परिवार, दोस्तों या विशेषज्ञों से मदद लेनी चाहिए। समय पर ध्यान देने से किसी की जान बचाई जा सकती है।
रोकथाम के लिए क्या करें?
आत्महत्या को रोकने के लिए जागरूकता और सक्रिय कदम जरूरी हैं। स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य जांच को नियमित करना चाहिए। काउंसलिंग सेंटर और हेल्पलाइन को बढ़ावा देना, शिक्षकों और पेशेवरों को मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण देना महत्वपूर्ण है। साथ ही, मीडिया को आत्महत्या से जुड़ी खबरों को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए ताकि नकारात्मक प्रभाव न पड़े।



