नई दिल्ली: भारत में सांप काटने की समस्या दशकों से ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में एक गंभीर चुनौती रही है, जो हर साल हजारों लोगों की जान लेती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों की श्रेणी में रखता है, लेकिन अब एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) इस संकट को और विकराल बना सकता है। बढ़ता तापमान और बदलते पर्यावरणीय हालात विषैले सांपों के लिए नए क्षेत्रों को अनुकूल बना रहे हैं, जिससे वे इलाके भी खतरे की जद में आ रहे हैं जो पहले सुरक्षित माने जाते थे।
भारत के घातक “बिग फोर” सांप
भारत में सांप काटने से होने वाली अधिकांश मौतों के लिए चार विषैले सांप जिम्मेदार हैं, जिन्हें “बिग फोर” के नाम से जाना जाता है: भारतीय नाग, कॉमन करैत, रसैल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर। इन सांपों का जहर इतना घातक होता है कि समय पर इलाज न मिलने से मृत्यु निश्चित है। ये सांप मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों, जंगलों और गांवों में पाए जाते हैं, जहां लोग इनके संपर्क में आसानी से आ जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन का सांपों पर असर
पीएलओएस नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिसीसेस पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया शोध के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में सांपों का भौगोलिक विस्तार तेजी से बदल रहा है। बढ़ता तापमान और नमी सांपों के लिए अनुकूल माहौल बना रहे हैं, जिससे वे नए क्षेत्रों में फैल रहे हैं। अध्ययन में जलवायु मॉडल के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि अगले कुछ दशकों में हरियाणा, राजस्थान, असम, मणिपुर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सांपों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां पहले सांपों की मौजूदगी कम थी, अब सांप काटने की घटनाएं बढ़ने की आशंका है।
सबसे ज्यादा खतरे वाले क्षेत्र
शोधकर्ताओं ने एक स्नेकबाइट रिस्क इंडेक्स विकसित किया है, जो दर्शाता है कि भारत के कई जिले सांप काटने के लिए नए हॉटस्पॉट बन सकते हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक के चिकबल्लापुर, हावेरी और चित्रदुर्ग, गुजरात के जामनगर और देवभूमि द्वारका, उत्तर-पूर्व में असम के नगांव, मोरीगांव और गोलाघाट, मणिपुर के टेंग्नौपाल और राजस्थान के प्रतापगढ़ जैसे जिले विशेष रूप से जोखिम में हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे मेघालय, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में सांपों के लिए अनुकूल आवास 100% से अधिक बढ़ सकता है, जिससे लाखों लोग इस खतरे की चपेट में आ सकते हैं।
सांप काटने की गंभीरता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हर साल 81,000 से 1.38 लाख लोग सांप काटने से मरते हैं, जिनमें से भारत में सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं। भारत में हर साल अनुमानित 50,000 से अधिक लोग सांप काटने का शिकार बनते हैं, और इनमें से कई की मौत हो जाती है। अधिकांश पीड़ित गरीब और ग्रामीण समुदायों से होते हैं, जो खेतों में काम करते समय सांपों के संपर्क में आते हैं। समय पर एंटीवेनम न मिलना और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इस समस्या को और गंभीर बनाती है।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
सांप काटने की घटनाएं न केवल स्वास्थ्य संकट हैं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बोझ भी बढ़ाती हैं। पीड़ितों के परिवारों को इलाज के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है, और कई बार मृत्यु या स्थायी अक्षमता के कारण परिवार की आजीविका छिन जाती है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में उचित सुविधाओं और प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी इस समस्या को और जटिल बनाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण सांपों का नए क्षेत्रों में फैलाव इस संकट को और व्यापक बना सकता है।
समाधान के लिए जरूरी कदम
एंटीवेनम की उपलब्धता बढ़ाएं: उच्च जोखिम वाले जिलों में एंटीवेनम का पर्याप्त भंडार सुनिश्चित किया जाए, ताकि समय पर इलाज संभव हो।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में सांप काटने के इलाज के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
जागरूकता अभियान: ग्रामीण समुदायों में सांपों से बचाव, प्राथमिक उपचार और सुरक्षित व्यवहार के बारे में जागरूकता फैलाई जाए। खेतों में काम करते समय जूते और दस्ताने पहनने जैसे सरल उपायों को बढ़ावा दिया जाए।
स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण: डॉक्टरों और नर्सों को सांप काटने की त्वरित पहचान और उपचार के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
जलवायु परिवर्तन पर नीतियां: पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने की दीर्घकालिक रणनीतियां सांपों के आवास विस्तार को सीमित करने में मदद कर सकती हैं।



