बढ़ती गर्मी का कहर: दुनिया के 2.4 अरब मजदूरों पर संकट

एक रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर हर साल 2.28 करोड़ से ज्यादा मजदूर गर्मी की वजह से चोटिल हो रहे हैं, और यह संख्या बढ़ती जा रही है।

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नई दिल्ली: आजकल की चिलचिलाती धूप और लगातार बढ़ते तापमान ने सिर्फ मौसम को नहीं बदला, बल्कि करोड़ों मेहनतकश लोगों की रोजी-रोटी और स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल दिया है। कल्पना कीजिए, खेतों में हल चलाने वाले किसान, निर्माण स्थलों पर ईंटें ढोने वाले मजदूर, या फैक्टरियों में मशीनों के बीच खड़े वर्कर ये सभी जब 40 डिग्री से ऊपर की गर्मी में घंटों काम करते हैं, तो उनके शरीर पर क्या बीतती होगी? एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर हर साल 2.28 करोड़ से ज्यादा मजदूर गर्मी की वजह से चोटिल हो रहे हैं, और यह संख्या बढ़ती जा रही है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन 2.4 अरब से अधिक श्रमिकों की हकीकत है जो अपनी जान जोखिम में डालकर परिवार चलाते हैं।

क्लाइमेट चेंज की मार: स्वास्थ्य और आजीविका पर दोहरा प्रहार

जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरणविदों की बहस नहीं रहा, यह मजदूरों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कृषि, निर्माण, मछली पकड़ने जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग पहले से ही लू और तेज धूप का शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की संयुक्त रिपोर्ट ‘क्लाइमेट चेंज एंड वर्कप्लेस हीट स्ट्रेस’ में साफ चेतावनी दी गई है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में स्थिति और भयावह हो सकती है। रिपोर्ट कहती है कि गर्मी से होने वाला तनाव अब उष्णकटिबंधीय देशों तक सीमित नहीं, बल्कि यूरोप जैसी जगहों पर भी फैल रहा है, जहां हाल ही में आई लू ने हजारों लोगों को प्रभावित किया।

उत्पादकता का नुकसान: हर डिग्री बढ़ने से 2-3% की गिरावट

2024 को रिकॉर्ड पर सबसे गर्म साल घोषित किया गया है, जहां कई जगहों पर तापमान 50 डिग्री तक पहुंच गया। WMO के अनुसार, 20 डिग्री सेल्सियस के बाद हर एक डिग्री की बढ़ोतरी मजदूरों की कार्यक्षमता को 2-3 प्रतिशत तक कम कर देती है। इससे न सिर्फ काम की गति धीमी पड़ती है, बल्कि हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण, किडनी की समस्याएं और दिमागी बीमारियां भी बढ़ जाती हैं। वैश्विक स्तर पर आधी से ज्यादा आबादी इस बढ़ते तापमान से प्रभावित है, और WMO की डिप्टी सेक्रेटरी जनरल को बैरेट ने कहा है कि यह अब आर्थिक मुद्दा भी बन गया है – क्योंकि स्वस्थ वर्कफोर्स के बिना अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है।

एशिया पर सबसे ज्यादा असर: भारत में मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ीं

एशिया महाद्वीप वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है, और 2024 यहां का सबसे गर्म वर्ष रहा, जहां औसत तापमान 1.04 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज हुआ। WMO की ‘स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2024’ रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और समाज सब प्रभावित हो रहे हैं। भारत में भी भारतीय मौसम विभाग ने पुष्टि की कि 2024 अब तक का सबसे गर्म साल था। यहां के मजदूरों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2019 रिपोर्ट अनुमान लगाती है कि 2030 तक ग्लोबल वार्मिंग से 5.8 प्रतिशत कामकाजी घंटों का नुकसान होगा, जो करीब 3.4 करोड़ नौकरियों के बराबर है। अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूर, जो सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं, उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि भारत का 75 प्रतिशत कार्यबल, यानी लगभग 3.8 करोड़ लोग, ऐसे कामों में लगे हैं जहां गर्मी का सीधा प्रभाव पड़ता है।

समाधान की राह: हीट एक्शन प्लान और ट्रेनिंग जरूरी

इस संकट से निपटने के लिए रिपोर्टों में कई व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं। सबसे पहले, हर उद्योग और क्षेत्र के हिसाब से लोकल मौसम को ध्यान में रखकर हीट एक्शन प्लान बनाएं। बुजुर्गों, बीमारों और कमजोर मजदूरों को विशेष सुरक्षा दें। मजदूरों, मालिकों, डॉक्टरों और यूनियनों को गर्मी से जुड़ी बीमारियों की पहचान और शुरुआती उपचार की ट्रेनिंग दी जाए। सरकारें, कंपनियां और विशेषज्ञ मिलकर ऐसे तरीके अपनाएं जो सस्ते, प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल हों। नई तकनीकों पर रिसर्च बढ़ाएं, ताकि गर्मी में भी स्वास्थ्य और काम दोनों जारी रहें। ILO इसे मजदूरों के बुनियादी अधिकारों से जोड़ती है, जबकि WHO के सह-निदेशक डॉक्टर जेरमी फर्रार कहते हैं कि यह गाइडलाइन करोड़ों जिंदगियों को बचा सकती है, असमानता घटा सकती है और मजबूत वर्कफोर्स तैयार कर सकती है।

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