नई दिल्ली: बचपन की मासूमियत को अक्सर हम घर की चारदीवारी में सुरक्षित मानते हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयान करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा बच्चे, यानी करीब 1.2 अरब बच्चे, हर साल किसी न किसी तरीके से शारीरिक सजा का शिकार होते हैं। यह आंकड़ा इतना चौंकाने वाला है कि हर मिनट औसतन 2,283 बच्चे इस तरह की हिंसा से गुजरते हैं। मारपीट, थप्पड़ या कोई भी ऐसी सजा जो दर्द पहुंचाने के मकसद से दी जाती है, न सिर्फ बच्चों की त्वचा पर निशान छोड़ती है, बल्कि उनके मन और दिमाग पर गहरे घाव कर जाती है।
सबसे कठोर सजाओं का शिकार 17 प्रतिशत बच्चे
रिपोर्ट में 58 देशों से जुटाए गए डेटा से पता चलता है कि हाल के अध्ययन में 17 प्रतिशत बच्चों को शारीरिक सजा के सबसे क्रूर रूपों से गुजरना पड़ा, जैसे सिर, चेहरे या कान पर मारना, या लगातार जोरदार पिटाई। यह सजा घरों में मां-बाप या अभिभावकों से मिलती है तो कभी स्कूलों में शिक्षकों से। WHO के स्वास्थ्य निर्धारक विभाग के प्रमुख एटियेन क्रूग ने साफ कहा है कि ऐसी सजाओं से बच्चों के व्यवहार में कोई सुधार नहीं आता, उल्टा उनके स्वास्थ्य, विकास और समाज के लिए नुकसान होता है। उन्होंने अपील की है कि अब इस पुरानी और हानिकारक परंपरा को जड़ से उखाड़ फेंकने का समय आ गया है, ताकि बच्चे हर जगह महफूज महसूस करें।
सिर्फ चोट नहीं, जीवनभर का बोझ
शारीरिक सजा का असर सिर्फ तात्कालिक दर्द तक नहीं रुकता। यह बच्चों के ब्रेन की बनावट और काम करने के तरीके को बदल देता है। रिपोर्ट में 49 निम्न और मध्यम आय वाले देशों के अध्ययन का जिक्र है, जहां ऐसी सजा झेलने वाले बच्चों का विकास उनके साथियों से औसतन 24 प्रतिशत पीछे पाया गया। इससे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं, जो डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सुसाइडल थॉट्स और कम आत्मसम्मान जैसी परेशानियां पैदा करते हैं। बड़ा होकर ऐसे बच्चे खुद हिंसक बन सकते हैं, नशे की गिरफ्त में आ सकते हैं या अपराध की राह पकड़ सकते हैं। सबसे दुखद यह कि यह चक्र चलता रहता है – वे अपने बच्चों के साथ भी वैसा ही सुलूक कर सकते हैं। WHO का मानना है कि समाज में हिंसा को सामान्य बनाने का यह एक बड़ा कारण है, जो पीढ़ियों को प्रभावित करता रहता है।
कौन से बच्चे सबसे ज्यादा खतरे में?
रिपोर्ट में साफ किया गया है कि कुछ बच्चे इस हिंसा के लिए ज्यादा आसान शिकार बनते हैं। जैसे, विकलांग बच्चे, या वे जिनके माता-पिता खुद बचपन में मार खा चुके हों। अगर घर में नशा, डिप्रेशन या मानसिक बीमारियां हों, या परिवार गरीबी, जातीय भेदभाव या नस्लवाद से जूझ रहा हो, तो खतरा और बढ़ जाता है। क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो यूरोप और मध्य एशिया में 41 प्रतिशत बच्चे घर में सजा झेलते हैं, जबकि मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में यह संख्या 75 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। 2 से 14 साल के बच्चों पर फोकस करें तो देशों में अंतर साफ दिखता है: कजाकिस्तान में 30 प्रतिशत, यूक्रेन में 32 प्रतिशत, सर्बिया में 63 प्रतिशत, सिएरा लियोन में 64 प्रतिशत और टोगो में 77 प्रतिशत।
स्कूलों में भी स्थिति गंभीर
स्कूल, जहां बच्चों को सीखना चाहिए, वहां भी सजा का सिलसिला जारी रहता है। पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में 25 प्रतिशत बच्चे प्रभावित हैं, लेकिन अफ्रीका और मध्य अमेरिका में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत से ऊपर है। लड़के और लड़कियां लगभग बराबर प्रभावित होते हैं, हालांकि वजहें अलग हो सकती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर, जातीय अल्पसंख्यक या भेदभाव झेलने वाले बच्चे इसकी चपेट में ज्यादा आते हैं।
रास्ता क्या है?
अच्छी बात यह है कि दुनिया के 67 देशों में घर और स्कूल दोनों जगह शारीरिक सजा पर पूरी तरह पाबंदी है। लेकिन WHO कहता है कि सिर्फ कानून काफी नहीं। जरूरत है जागरूकता फैलाने की, माता-पिता और शिक्षकों को बताने की कि सजा की जगह पॉजिटिव डिसिप्लिन के तरीके अपनाएं। यह न सिर्फ बच्चों की रक्षा करेगा, बल्कि समाज को हिंसा मुक्त बनाएगा। आखिरकार, बच्चे हमारा भविष्य हैं, उन्हें दर्द नहीं, प्यार और मार्गदर्शन की जरूरत है।



