सेल्फी का जुनून: Cosmetic surgery की बढ़ती मांग

हाल ही में किए गए एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि ‘परफेक्ट सेल्फी’ की चाहत ने युवाओं में Cosmetic surgeryकी मांग को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है।

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नई दिल्ली: आज के डिजिटल युग में सेल्फी लेना केवल एक शौक नहीं, बल्कि एक ऐसी आदत बन चुकी है जो युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को गहरे रूप से प्रभावित कर रही है। हाल ही में भारत के प्रमुख त्वचा विशेषज्ञों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि ‘परफेक्ट सेल्फी’ की चाहत ने युवाओं में कॉस्मेटिक सर्जरी (cosmetic surgery) की मांग को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। इस अध्ययन में 4,500 से अधिक युवाओं को शामिल किया गया, और इसके प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया पर एडिटेड तस्वीरें पोस्ट करने की आदत युवाओं को अपनी शारीरिक बनावट बदलने के लिए प्रेरित कर रही है। यह प्रवृत्ति न केवल शारीरिक छवि पर असर डाल रही है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन रही है।

सेल्फी संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध

यह कोई नई बात नहीं है कि सेल्फी और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है। 2020 में दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और चेन्नई में 2,800 युवाओं पर किए गए एक शोध में पाया गया था कि बार-बार सेल्फी लेने और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करने की आदत सामाजिक चिंता (सोशल एंग्जायटी) को बढ़ाती है। इस शोध में यह भी सामने आया कि बिना एडिट की गई सेल्फी जहां आत्मविश्वास को कम करती हैं, वहीं फिल्टर और एडिटिंग टूल्स का इस्तेमाल करने वाली तस्वीरें युवाओं को अवास्तविक सौंदर्य मानकों की तुलना में फंसा देती हैं। खासकर 18-30 आयु वर्ग की युवतियों में कॉस्मेटिक सर्जरी की मांग में 40% की वृद्धि देखी गई है, जो सीधे तौर पर सोशल मीडिया के दबाव से जुड़ी है।

विशेषज्ञों की चेतावनी: एक खतरनाक चक्र

प्रमुख त्वचा विशेषज्ञ और अध्ययन के सह-लेखक डॉ. अनीता शर्मा (काल्पनिक नाम) का कहना है कि “पिछले कुछ सालों में हमने देखा है कि कई युवा मरीज अपनी एडिटेड सेल्फी दिखाकर कहते हैं कि वे ठीक वैसी शक्ल चाहते हैं। यह एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मुद्दा है।” विशेषज्ञों का मानना है कि सेल्फी संस्कृति ने युवाओं को एक ऐसे चक्र में फंसा दिया है, जहां वे लगातार अपनी तुलना डिजिटल रूप से बदली हुई छवियों से करते हैं। यह न केवल आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ावा देता है। अध्ययन में शामिल 60% युवाओं ने स्वीकार किया कि वे अपनी सेल्फी को ‘परफेक्ट’ बनाने के लिए कम से कम 3-4 फिल्टर का उपयोग करते हैं।

भारत में सेल्फी संस्कृति का गहरा प्रभाव

भारत में सेल्फी संस्कृति का प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह देश पहले ही सेल्फी से जुड़ी दुर्घटनाओं और मौतों के मामले में दुनिया में सबसे आगे है। खतरनाक स्थानों पर तस्वीरें खींचने की होड़ ने कई युवाओं की जान जोखिम में डाली है। अब यह नई प्रवृत्ति कॉस्मेटिक सर्जरी की मांग को बढ़ाकर एक और चुनौती पेश कर रही है। नाक की सर्जरी (राइनोप्लास्टी), चेहरे की बनावट बदलने वाली प्रक्रियाएं और त्वचा को गोरा करने वाली लेजर ट्रीटमेंट की मांग में पिछले पांच सालों में 35% की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति युवाओं की वास्तविक सुंदरता और आत्मविश्वास को कमजोर कर रही है।

समाधान की दिशा में कदम

इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ कई उपाय सुझा रहे हैं:

  • जागरूकता अभियान: स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता और मीडिया जागरूकता के कार्यक्रम शुरू किए जाएं, ताकि युवा वास्तविक और डिजिटल छवियों के बीच अंतर समझ सकें।
  • मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन: कॉस्मेटिक सर्जरी कराने से पहले मरीजों की मानसिक स्थिति का आकलन अनिवार्य किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो कि उनकी मांग सोशल मीडिया के दबाव से प्रेरित नहीं है।
  • सोशल मीडिया नियम: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को फिल्टर और एडिटिंग टूल्स के उपयोग पर जागरूकता बढ़ाने के लिए कदम उठाने चाहिए।
  • परामर्श सेवाएं: युवाओं के लिए काउंसलिंग सेंटर स्थापित किए जाएं, जहां वे अपनी शारीरिक छवि और आत्मविश्वास से जुड़े मुद्दों पर बात कर सकें।

Usha Mehta

ushamehta0013@gmail.com

NewG India का सबसे युवा चेहरा, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद IGNOU और ABP न्यूज़ नेटवर्क जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप की। सोशल और कॉमर्स विषयों की गहरी समझ हैं कलम के साथ आवाज में भी धार हैं। NewG India में बतौर कंटेंट डेवलपर व एंकर अपनी जिम्मेदारी उषा मेहता बखूबी निभा रही हैं ।

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