नई दिल्ली: ‘मैं राजनिवास में नहीं, बल्कि सड़कों पर नजर आउंगा…।‘ शपथ लेने के बाद उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने सबसे पहले यही टिप्पणी की थी। बाद में वे अपने इस वचन पर खरे उतरते भी नजर आए। हालांकि, उनकी यह कार्यशैली उस वक्त की दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार को रास नहीं आयी। उनके कई फैसलों से विवाद भी हुआ और ये आरोप भी लगे कि उनके जरिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले दरवाजे से दिल्ली सरकार की बांह मरोड़ने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि सरकार और उनमें टकराव भी हुआ लेकिन अधिकांश मौकों पर वे खुद को सही साबित करने में कामयाब भी रहे।
इसके बावजूद हाल के दशकों में दिल्ली ने शायद ही इस तरह का सक्रिय उपराज्यपाल दिल्ली में देखा होगा। जो गंदे नालों की सफाई को देखने के लिए भी पहुंचा और प्रशासनिक लहजे से कई ऐसे फैसले भी किए, जिनकी वजह से लोगों को सीधे राहत मिली। जी 20 की कामयाबी में सबसे अधिक क्रेडिट भी उपराज्यपाल के तौर पर सक्सेना को ही मिला।
जी 20 के दौरान सक्सेना का ही ये विजन था कि न सिर्फ नई दिल्ली बल्कि एयरपोर्ट से लेकर नई दिल्ली के अलावा भी कई क्षेत्रों में जबरदस्त डेवलपमेंट के काम हुए। एयरपोर्ट से लेकर सरदार पटेल मार्ग और नई दिल्ली एरिया में जिस तरह से फाउंटेन और मूर्तियां लगाकर सजाया गया। ये एक तरह से दिल्ली के इस हिस्से का कायापलट करने जैसा था। धौलाकुआं जैसे इलाके में उन्होंने लीक से हटकर काम किया। जिसका नतीजा ये है कि जी 20 खत्म होने के बाद भी इस इलाके में आने जाने वाले लोगों को इसका फायदा मिल रहा है। जी 20 के कामकाज की प्लानिंग से लेकर योजना के अमली जामा पहनाने तक सक्सेना खुद शामिल रहे। यही नहीं, वे कई परियोजनाओं का जायजा लेने के लिए खुद ही पहुंच जाते थे।

दिल्ली की तत्कालीन सरकार से टकराव के बारे में जब मीडिया ने उनसे सवाल पूछे तो उन्होंने सवालों को टाला नहीं बल्कि स्पष्ट किया कि वे भले ही उपराज्यपाल पद पर हों लेकिन वे खुद को दिल्ली का लोकल गार्जियन मानते हैं और इसी नाते, उन्हें जो दिल्ली के हित में लगेगा, वे बिना किसी दबाव के करेंगे। यही वजह है कि उन्होंने कई ऐसे कड़े फैसले लिए कि उनके विरोधियों ने उनको न सिर्फ निशाने पर लिया बल्कि कोर्ट तक में घसीटा।
हालांकि ये बहुत कम लोगों को पता होगा लेकिन दिल्ली में यमुना नदी के तटों को संवारने की उन्होंने ही कवायद तेज की और नतीजा ये है कि पूरा यमुना तट न सही, लेकिन बहुत बड़ा यमुना तट न सिर्फ साफ हुआ बल्कि वहां हरियाली भी है और अब लोगों को बांसेरा और असिता जैसे स्थल भी मिले। जहां वे घूम भी सकते हैं और स्वच्छ हवा का आनंद भी लेते हैं।
सक्सेना ने लीक से हटकर कई काम किए। मसलन, उन्होंने सिनेमा घरों के लाइसेंस के लिए दिल्ली पुलिस की भूमिका ही खत्म कर दी। उनका ये फैसला इस आधार पर तार्किक था कि इसमें पुलिस की कोई भूमिका की जरूरत ही नहीं है। रेवेन्यू डिपार्टमेंट ये काम कर सकता है। इसका फायदा ये हुआ कि इस तरह के कामों से पुलिस को छुटकारा मिला है और इससे अब तक इन कामों में उलझे पुलिस वाले अपना मूल काम यानी कानून व्यवस्था पर ध्यान दे सकेंगे।
सबसे अधिक विवाद : उनके जिस फैसले पर सबसे अधिक विवाद हुआ, वो शराब नीति की जांच का आदेश था। इसी जांच की वजह से आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को जेल जाना पड़ा। इसके अलावा उन्होंने सीएम आवास पर हुए खर्चों की जांच भी कराई और दिल्ली जल बोर्ड के घोटाले की जांच के भी आदेश दिए। जिसका कई नेताओं को संकट भी झेलना पड़ रहा है।

उपराज्यपाल के इन फैसलों से राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि भले ही उपराज्यपाल ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करके इस तरह की जांच कराई। लेकिन उनका ये भी कहना है कि इन फैसलों की बदौलत ही दिल्ली में बीजेपी का 27 साल बाद वापसी का रास्ता साफ हो सका।
अफसरों पर गाज
सक्सेना ने तीन साल में भ्रष्ट अफसरों पर भी नकेल कसी। सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट के मामले में तो उन्होंने कई अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने जैसे कदम भी उठाए। इसी तरह से उन्होंने 400 से अधिक ऐसी नियुक्तियां रद्द करके लोगों को घर भेज दिया। उनका तर्क था कि ये नियुक्तियां अपनों को ही रेवड़ियां बांटने के मकसद से नियमों को ताक पर की गई थीं। महत्वपूर्ण है कि इनमें से अधिकांश नियुक्तियां आम आदमी पार्टी की सरकार के वक्त हुईं। लेकिन ऐसा नहीं कि उन्होंने नियुक्तियां रद्द कीं। उन्होंने कई ऐसे पदों को मंजूरियां भी दीं और नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज भी की, जो सालों से अटकी हुई थी।



