Kishtwar Incident: चिशोती गांव की बाढ़ के पीछे छिपे राज

Kishtwar में चिशोती गांव के पास कोई स्थानीय मौसम स्टेशन नहीं है, इसलिए घटना के वक्त की सटीक बारिश की जानकारी नहीं मिल पाई। जिला स्तर के रिकॉर्ड बताते हैं कि 15 अगस्त 2025 को सिर्फ 5 मिलीमीटर पानी बरसा, जबकि 14 अगस्त को बिल्कुल सूखा रहा।

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नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले (Kishtwar incident) में चिशोती गांव को हाल ही में आई अचानक बाढ़ ने तबाह कर दिया। यह घटना उत्तराखंड के धराली इलाके में हुई आपदा की याद दिलाती है, जहां भी वजहों पर बहस छिड़ी हुई है। सवाल यही है कि क्या यह सब बादल फटने से हुआ, या ऊपरी पहाड़ों में कोई और वजह काम कर रही थी? मौसम विभाग के आंकड़े तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों की राय बंटी हुई नजर आ रही है।

मौसम आंकड़ों में छिपा रहस्य

Kishtwar में चिशोती गांव के पास कोई स्थानीय मौसम स्टेशन नहीं है, इसलिए घटना के वक्त की सटीक बारिश की जानकारी नहीं मिल पाई। जिला स्तर के रिकॉर्ड बताते हैं कि 15 अगस्त 2025 को सिर्फ 5 मिलीमीटर पानी बरसा, जबकि 14 अगस्त को बिल्कुल सूखा रहा। मौसम विज्ञान केंद्र, श्रीनगर के प्रमुख मुख्तियार अहमद ने कुछ रिपोर्ट्स में बताया कि उपग्रह और रडार से भारी वर्षा के संकेत मिले थे। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि गांव का ऊपरी हिस्सा जंस्कार रेंज से जुड़ा है, जहां ग्लेशियर या उससे बनी झील के फटने की आशंका हो सकती है, जो बाढ़ का रूप ले लेती है। धराली की घटना से मिलती-जुलती परिस्थितियां यहां भी दिख रही हैं। वहां भी ग्लेशियर झील टूटने की बातें उड़ीं, लेकिन वाडिया हिमालयन संस्थान के विशेषज्ञों ने बिना ठोस सैटेलाइट डेटा के कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया। अभी तक कोई पक्का सबूत नहीं मिला है कि वहां क्या हुआ था।

बादल फटने की थ्योरी: हां या ना?

श्रीनगर मौसम केंद्र के अधिकारी मोहम्मद हुसैन मीर का मानना है कि इतनी बड़ी तबाही बिना बादल फटे नहीं हो सकती। उन्होंने समझाया कि पहाड़ी इलाकों में मौसम मैदानों से अलग होता है। यहां दो पहाड़ों के बीच बने नालों में हवाओं का टकराव ऊंचाई पर बादलों को जमा कर देता है। अगर यह स्थिति आधे घंटे तक बनी रही, तो नमी इतनी बढ़ जाती है कि पूरा पानी एक छोटे से इलाके – महज 50-100 मीटर के दायरे में – गिर जाता है। नतीजा? पास की मौसम स्टेशन, जैसे पहलगाम (चिशोती से सिर्फ 4 किमी दूर), पर ज्यादा बारिश दर्ज नहीं होती। मीर कहते हैं, पहाड़ों में एक गदेरे में तूफान आ सकता है, जबकि पड़ोस वाला सूखा रह जाए। यही बादल फटने की असली वजह है।

विशेषज्ञों में मतभेद: बादल इतने छोटे नहीं होते

लेकिन भारतीय मौसम विज्ञान सोसायटी के अध्यक्ष और IMD के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. आनंद शर्मा इस व्याख्या से सहमत नहीं। उन्होंने कहा कि बारिश लाने वाले बादल इतने छोटे 50-100 मीटर नहीं हो सकते। ये तो 15-20 किमी तक फैले होते हैं और 15 किमी ऊपर तक जाते हैं। उनके मुताबिक, समस्या का मूल कैचमेंट एरिया में है – यानी जहां से पानी बहकर आता है। धराली या किश्तवाड़ में बाढ़ का मतलब यह नहीं कि वहीं बारिश हुई। जैसे देहरादून की बाढ़ मसूरी की वजह से आती है, या दिल्ली में यमुना का उफान हिमाचल-उत्तराखंड की बारिश से। शर्मा सलाह देते हैं कि चिशोती के ऊपरी गदेरों और ट्रिब्यूटरीज की जांच होनी चाहिए। क्या वहां ज्यादा पानी जमा हुआ था? हर्षिल का मौसम स्टेशन (करीब 3-4 किमी दूर) भी कोई बड़ा फर्क नहीं डालता, क्योंकि हम जमीन नहीं, आसमान की दूरी नापते हैं – जो महज 200-300 मीटर होती है।

क्या कहती है हकीकत?

यह घटना हिमालयी इलाकों में बढ़ती आपदाओं की ओर इशारा करती है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलना और अनियोजित विकास – सब मिलकर ऐसे हादसों को आम बना रहे हैं। लेकिन बिना ठोस जांच के, वजहें सिर्फ अटकलें ही रह जाती हैं। सरकार और वैज्ञानिकों को मिलकर सैटेलाइट डेटा और फील्ड स्टडी से सच सामने लाना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियां रोकी जा सकें।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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