डेनिम कचरे से स्टाइलिश कपड़े, IIT Delhi देगी फैशन को नया आयाम

IIT दिल्ली के टेक्सटाइल और फाइबर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार और प्रोफेसर बी.एस. बुटोला की अगुआई में शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो डेनिम कचरे को रीसाइक्लिंग के दौरान उसकी मूल गुणवत्ता बरकरार रखती है।

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नई दिल्ली: भारत में हर साल लाखों टन पुराने कपड़े कचरे के ढेर में बदल जाते हैं, जिनमें से ज्यादातर लैंडफिल में पहुंचकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। खास तौर पर डेनिम जैसे कपड़े, जो हमारी जींस और जैकेट्स का हिस्सा हैं, सड़ने में सालों लगाते हैं। अनुमान है कि भारत में हर साल करीब 40 लाख टन कपड़ा कचरा पैदा होता है, लेकिन इसमें से केवल 5% ही दोबारा उपयोग में लाया जाता है। बाकी कचरा पर्यावरण के लिए बोझ बन जाता है। पुराने कपड़ों को रीसाइक्लिंग करना आसान नहीं, क्योंकि अलग-अलग रंग और फाइबर की बनावट इसे जटिल बनाते हैं। साथ ही, पारंपरिक रीसाइक्लिंग से कपड़े की मजबूती और गुणवत्ता कम हो जाती है। लेकिन अब, आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है, जो डेनिम कचरे को स्टाइलिश, टिकाऊ और पर्यावरण के लिए फायदेमंद कपड़ों में बदल सकती है।

गुणवत्ता और आराम में कोई समझौता नहीं

आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल और फाइबर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार और प्रोफेसर बी.एस. बुटोला की अगुआई में शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो डेनिम कचरे को रीसाइक्लिंग के दौरान उसकी मूल गुणवत्ता बरकरार रखती है। इस प्रक्रिया में पुराने डेनिम को तोड़कर उच्च गुणवत्ता वाले धागे बनाए जाते हैं, जिन्हें फिर सीमलेस होल गारमेंट तकनीक से बुना जाता है। इस तकनीक में 25 से 75% तक रीसाइक्ड धागों का उपयोग होता है। शोध से पता चला है कि 50% रीसाइक्ड धागों के साथ भी कपड़े का स्पर्श, मजबूती और आराम नए कपड़े जैसा ही रहता है। प्रोफेसर मजूमदार के मुताबिक, हमने रीसाइक्ड धागों की खुरदरापन और कठोरता को कम करने के लिए खास सॉफ्टनिंग प्रक्रिया अपनाई, जिससे कपड़ा नरम और पहनने में आरामदायक हो गया। यह तकनीक न सिर्फ डेनिम के लिए, बल्कि किसी भी पुराने कपड़े के लिए कारगर हो सकती है। यह नई तकनीक न केवल फैशन इंडस्ट्री के लिए गेम-चेंजर है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान दे सकती है।

पर्यावरण को राहत, जलवायु पर सकारात्मक असर

इस शोध के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन में छपे हैं। शोधकर्ताओं ने पानीपत के टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग हब से डेटा लेकर इस तकनीक के पर्यावरणीय फायदों का विश्लेषण किया। नतीजों से पता चला कि इस तकनीक से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 30-40% तक कम हो सकता है। इसके अलावा, अम्लीय वर्षा और जीवाश्म ईंधन की खपत में भी 40% तक कमी आती है, जबकि ओजोन परत को होने वाला नुकसान 60% तक घटाया जा सकता है। यह तकनीक कपास की खेती पर निर्भरता को भी कम करती है। कपास की खेती में भारी मात्रा में पानी, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग होता है, जो पर्यावरण और जलवायु पर नकारात्मक असर डालता है। रीसाइक्ड फाइबर का उपयोग करके ये बोझ कम किया जा सकता है। प्रोफेसर बुटोला ने बताया, हम अब इस दिशा में काम कर रहे हैं कि एक कपड़े को कितनी बार रीसाइक्लिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि कचरे को और कम किया जा सके।

फैशन के साथ पर्यावरण संरक्षण का मेल

यह तकनीक न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह फैशन इंडस्ट्री को भी नया दिशा दे रही है। रीसाइक्ड डेनिम से बने कपड़े न सिर्फ स्टाइलिश और टिकाऊ हैं, बल्कि ये उपभोक्ताओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का मौका भी देते हैं। इस तकनीक के जरिए पुरानी जींस को नई जिंदगी दी जा सकती है, जिससे कचरे का बोझ कम होगा और फैशन इंडस्ट्री में सस्टेनेबिलिटी को बढ़ावा मिलेगा।

मुख्य बिंदु

  • कचरे का आंकड़ा: भारत में हर साल 40 लाख टन कपड़ा कचरा, जिसमें से केवल 5% रीसाइक्लिंग।
  • नई तकनीक: आईआईटी दिल्ली की तकनीक से डेनिम कचरे से स्टाइलिश कपड़े, गुणवत्ता बरकरार।
  • पर्यावरणीय फायदा: 30-40% कम ग्रीनहाउस गैसें, 60% कम ओजोन नुकसान, कपास की खेती पर कम दबाव।
  • प्रक्रिया: 25-75% रीसाइक्ड धागों का उपयोग, सॉफ्टनिंग से नए जैसा स्पर्श।
  • भविष्य: कपड़ों की बार-बार रीसाइक्लिंग की संभावनाओं पर शोध।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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