नई दिल्ली: कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के चुनाव में सचिव पद पर मुकाबला भाजपा बनाम भाजपा था। पिछले ढ़ाई दशकों से इस पद पर कब्जा जमाए भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी को जीत मिली है, जबकि उन्हीं की पार्टी के पूर्व सांसद संजीव बालियान को हार का सामना करना पड़ा है। रूडी ने 100 मतों के अंतर से जीत का परचम लहराया। इसके पीछे माना जा रहा है कि राजीव प्रताप रूडी को विपक्ष के सांसदों का बड़ी संख्या में समर्थन मिला है।
विपक्ष से सोनिया गांधी और मल्लि कार्जुन खरगे जैसे नेताओं ने वोट दिया तो वहीं सत्ता पक्ष से अमित शाह भी मतदान किया। इस बार कुल 1295 मौजूदा और पूर्व सांसदों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। ऐसा पहली बार था, जो इतनी बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए सांसद और पूर्व सांसद पहुंचे।
इससे पहले राजीव प्रताप रूडी निर्विरोध ही जीत हासिल करते रहे हैं। राजीव प्रताप रूडी ने जीत के बाद खुशी जताई और कहा कि यह ऐतिहासिक है। साथ ही यह भी कहा मेरा पैनल जीत गया है, जिसमेंअ लग-अलग दलों के सांसद शामिल हैं। सांसदों ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हमारे पैनल को कामकाज के आधार पर जिताया है।
कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में गवर्निंग काउंसिल की जीत के पश्चात भव्य स्वागत का आयोजन किया गया। धन्यवाद।#ConstitutionalClub #rajivprataprudy @ccoi_1947 pic.twitter.com/yTvm1BLOYB
— Rajiv Pratap Rudy (@RajivPratapRudy) August 13, 2025
भाजपा के ही एक सांसद निशिकांत दुबे ने कहा था कि इस बार कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के चुनाव में सत्ता परिवर्तन होगा और संजीव बालियान को जीत मिलेगी। वह मजबूती से बालियान का प्रचार कर रहे थे। पांच बार से लोकसभा सांसद राजीव प्रताप रूडी लंबे समय से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के सचिव हैं। इस चुनाव में कास्ट ऐंगल भी लोगों ने जोड़ लिया। संजीव बालियान पश्चिम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और जाट बिरादरी हैं। इसके अलावा राजीव प्रताप रूडी पेशे से पायलट रहे हैं और ठाकुर हैं।
राजीव प्रताप रूडी की कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के सचिव (प्रशासन) पद जीत ने न केवल रूडी के 25 साल पुराने दबदबे को बरकरार रखा, बल्कि बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भी कई राजनीतिक समीकरणों को हवा दी है। विपक्षी दलों के समर्थन और बिहार के सांसदों की एकजुटता ने इस जीत को बिहार की अस्मिता से जोड़ दिया है, जिसका असर विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है।
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विपक्ष की रणनीति और बिहार की अस्मिता
इस चुनाव में रूडी को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और निर्दलीय सांसदों का भारी समर्थन मिला। विपक्षी नेताओं, जैसे सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे, ने न केवल मतदान में हिस्सा लिया, बल्कि रूडी के पक्ष में सक्रिय रूप से समर्थन जुटाया।
विपक्ष ने जीत को बिहार बनाम गुजरात की लड़ाई प्रचारित किया
विपक्ष ने रूडी की जीत को बिहार बनाम गुजरात की लड़ाई के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की, यह दावा करते हुए कि रूडी को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन नहीं था। विपक्ष अब इस जीत को बिहार विधानसभा चुनाव में राजपूत मतदाताओं के मनोबल को बढ़ाने और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ एक संदेश के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बना रहा है।
बिहार में राजपूत वोटरों पर प्रभाव
बिहार में राजपूत मतदाता एक महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं, और रूडी की जीत को राजपूत अस्मिता से जोड़ा जा रहा है। रूडी ने हाल ही में “जय सांगा” नारे के साथ राजपूत समुदाय को एकजुट करने का अभियान शुरू किया है, जो सोशल मीडिया और बिहार में उनके कार्यक्रमों में खूब चर्चा में है। बिहार के कई सांसदों और पूर्व सांसदों, जैसे शकुनि चौधरी, अरुण कुमार और रामकृपाल यादव, ने दिल्ली पहुंचकर रूडी के पक्ष में वोट डाला, जिसे बिहार की क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ा गया। माना जा रहा है कि रूडी की इस जीत से राजपूत मतदाताओं में उत्साह बढ़ेगा, जो विधानसभा चुनाव में भाजपा और एनडीए के लिए फायदेमंद हो सकता है। हालांकि, अगर भाजपा नेतृत्व रूडी को दरकिनार करता है, तो इससे राजपूत वोटरों में नाराजगी भी फैल सकती है, जैसा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मगध और शाहाबाद क्षेत्रों में देखा गया था।
भाजपा के भीतर खेमेबाजी और नेतृत्व पर सवाल
चुनाव में संजीव बालियान को कथित तौर पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, खासकर अमित शाह और जेपी नड्डा का समर्थन प्राप्त था। इसके बावजूद, रूडी की जीत ने भाजपा के अंदर एक धड़े की नाराजगी को उजागर किया, जो केंद्रीय नेतृत्व से असंतुष्ट है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत रूडी को बिहार भाजपा में एक मजबूत चेहरा बनाएगी, खासकर राजपूत वोटरों के बीच। दूसरी ओर, विपक्ष इस जीत को भाजपा नेतृत्व की हार के रूप में पेश कर रहा है, जिसे वे बिहार चुनाव में “बिहार बनाम गुजरात” के नैरेटिव के साथ जोड़ रहे हैं।



