पटना: एक तरफ बिहार सरकार ‘हर घर नल जल योजना’ के जरिए लोगों तक साफ पानी पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर सच्चाई बेहद चिंताजनक है। बिहार के 38 में से 31 जिलों के पेयजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन जैसी हानिकारक धातुओं की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। यह चौंकाने वाला खुलासा बिहार आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (2024-25) में हुआ है, जिससे पता चलता है कि लगभग 26% ग्रामीण वार्डों में भूजल पीने लायक नहीं है।
भूजल में जहर का कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक, भूजल की इस खराब गुणवत्ता के पीछे कई कारण हैं।
- औद्योगीकरण और शहरीकरण: कारखानों और शहरों से निकलने वाले कचरे को बिना साफ किए सीधे जमीन और नदियों में बहा दिया जाता है, जिससे पानी जहरीला हो रहा है।
- कृषि: किसान अधिक पैदावार के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, जो बारिश के पानी के साथ रिसकर भूजल में मिल जाते हैं।
- जलवायु परिवर्तन: बारिश की कमी और भूजल का अत्यधिक दोहन, दोनों ही भूजल के स्तर को नीचे गिरा रहे हैं, जिससे पानी में मौजूद हानिकारक तत्व और भी ज्यादा गाढ़े हो जाते हैं।
- जानलेवा आर्सेनिक: 20 जिले प्रभावित
- बिहार के 20 जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर मिली है। लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से आर्सेनिकोसिस नामक बीमारी हो सकती है, जिससे त्वचा पर घाव, रंग में बदलाव और यहां तक कि त्वचा, फेफड़े और आंतरिक अंगों का कैंसर भी हो सकता है। यह हृदय रोग और मधुमेह का कारण भी बन सकता है। प्रभावित जिलों में भागलपुर, बक्सर, सारण, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जैसे जिले शामिल हैं।
फ्लोराइड से हड्डियों और दांतों को खतरा
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, ज्यादा फ्लोराइड वाला पानी पीने से फ्लोरोसिस नामक बीमारी होती है, जो दांतों पर धब्बे और हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकती है। बांका, गया, जमुई, नालंदा, नवादा और शेखपुरा जिलों में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई है।
यूरेनियम और आयरन भी बना खतरा
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के विश्लेषण में सीवान, सारण, भभुआ और खगड़िया जैसे जिलों के भूजल में रेडियोधर्मी यूरेनियम की मात्रा भी अधिक मिली है, जिससे गुर्दे की समस्याएं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
इसके अलावा, बिहार के 33 जिलों के भूजल में आयरन की मात्रा ज्यादा है, जिससे एनीमिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
बच्चों पर ब्लू बेबी सिंड्रोम का खतरा
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भूविज्ञान के शिक्षकों का कहना है कि पानी में नाइट्रेट की अधिक मात्रा शिशुओं के लिए बेहद खतरनाक है, जिससे ब्लू बेबी सिंड्रोम हो सकता है। अरवल, भागलपुर, भोजपुर, बक्सर और पटना जैसे जिलों में नाइट्रेट का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया है।
गंभीर समस्या का पुराना इतिहास: बिहार के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य हानिकारक तत्वों की मौजूदगी की बात कई सालों से सामने आ रही है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट में समय-समय पर इस खतरे को उजागर किया जाता रहा है। 2002-2003 के बाद से, बिहार सरकार का लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) नियमित रूप से पानी के नमूनों का परीक्षण कर रहा है।
गंगा नदी का प्रभाव: बिहार के कई जिले गंगा नदी के बेसिन में आते हैं। भूजल विशेषज्ञ मानते हैं कि गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे के जिलों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा होती है। यह एक प्राकृतिक भूवैज्ञानिक घटना है, लेकिन औद्योगीकरण, शहरों से निकलने वाला सीवेज और कृषि में कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है।
सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत: केंद्र और राज्य सरकारें, जैसे ‘जल जीवन मिशन’ और ‘हर घर नल जल योजना’ के तहत सभी घरों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। हालांकि, इस खबर से पता चलता है कि इन प्रयासों के बावजूद जमीनी स्तर पर भूजल की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। इसके अलावा, कई जगहों पर नल-जल योजना के तहत सप्लाई हो रहा पानी भी दूषित पाया गया है।
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका: इस खबर का मुख्य आधार बिहार आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (2024-25) है, जिसे विधानसभा में पेश किया गया था। इस तरह की आधिकारिक रिपोर्टें राज्य की वास्तविक स्थिति को दर्शाती हैं और सरकारी दावों की पड़ताल करती हैं।



