नई दिल्ली: 17वें उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जो 15 सितंबर को होना है, लेकिन इस बार भी जम्मू-कश्मीर से राज्य सभा की चार सीटें खाली रहेंगी। यह लगातार दूसरा मौका है जब उप राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा हो रहा है। केंद्र शासित प्रदेश की ये सीटें इसलिए रिक्त हैं, क्योंकि निर्वाचन आयोग ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के लगभग 10 महीने बाद भी इन रिक्तियों को भरने के लिए चुनाव नहीं कराए हैं। राज्य सभा सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। चूंकि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव अभी नहीं हुए हैं, इसलिए वहां से राज्य सभा की ये चार सीटें खाली पड़ी हैं।
लंबे समय से खाली हैं सीटें
जम्मू-कश्मीर का संसद के उच्च सदन (राज्य सभा) में 15 फरवरी, 2021 से कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। उस दिन गुलाम नबी आजाद और नजीर अहमद लावे ने अपना कार्यकाल पूरा किया था। इससे पहले, दो अन्य सदस्य, फयाज अहमद मीर और शमशीर सिंह मन्हास, ने भी उसी वर्ष 10 फरवरी को अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था।
उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया
उप राष्ट्रपति का चुनाव लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इसमें उच्च सदन के मनोनीत सदस्य भी मतदान के पात्र होते हैं। वर्तमान में, लोक सभा में कोई भी मनोनीत सदस्य नहीं है।
लोक सभा: कुल 543 सदस्यों में से पश्चिम बंगाल के बशीरहाट की एक सीट खाली है।
राज्य सभा: कुल 245 सदस्यों में से 6 सीटें रिक्त हैं। इनमें से चार सीटें जम्मू-कश्मीर से हैं, जबकि एक-एक सीट पंजाब और झारखंड से है।
NDA की मजबूत स्थिति
उप राष्ट्रपति चुनाव में दोनों सदनों की प्रभावी संख्या 781 है। उम्मीदवार को जीतने के लिए 391 मतों की आवश्यकता होगी, बशर्ते सभी पात्र मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करें।
लोक सभा में NDA का समर्थन: 542 सदस्यों में से 293 का समर्थन प्राप्त है।
राज्य सभा में NDA का समर्थन: 240 की प्रभावी संख्या में से 129 सदस्यों का समर्थन है।
यदि मनोनीत सदस्य भी NDA उम्मीदवार के समर्थन में मतदान करते हैं, तो सत्तारूढ़ गठबंधन को लगभग 422 सदस्यों का समर्थन प्राप्त होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन इस चुनाव में मजबूत स्थिति में है।
जम्मू-कश्मीर में राज्य सभा सीटें खाली होने का कारण
जम्मू-कश्मीर से राज्य सभा की चार सीटें खाली होने का मुख्य कारण वहां विधानसभा का न होना है। राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव राज्य की विधानसभा के सदस्य करते हैं। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में विभाजित करने के बाद, वहां विधानसभा भंग हो गई थी। तब से लेकर अब तक, जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं। इस वजह से वहां कोई निर्वाचित विधायक नहीं है, जो राज्यसभा सीटों के लिए मतदान कर सके। गुलाम नबी आजाद और नजीर अहमद लावे का कार्यकाल 15 फरवरी, 2021 को पूरा हुआ। फयाज अहमद मीर और शमशीर सिंह मन्हास का कार्यकाल 10 फरवरी, 2021 को समाप्त हुआ। इन चारों सांसदों का कार्यकाल पूरा होने के बाद से ये सीटें खाली हैं।
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संवैधानिक मुद्दा और चुनाव आयोग का असमंजस
यह केवल चुनाव न होने का मामला नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक मुद्दा भी है। संविधान के अनुच्छेद 83 के अनुसार, राज्यसभा एक स्थायी सदन है जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। यह “रोटेशन” का सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि राज्य सभा कभी पूरी तरह से भंग न हो।
जम्मू-कश्मीर में कई बार आपातकाल और अन्य राजनीतिक कारणों से यह रोटेशन का नियम बाधित हुआ है। इस वजह से, चारों राज्य सभा सांसदों का कार्यकाल एक साथ समाप्त हो गया। अगर अभी चुनाव होते हैं, तो इन सभी का कार्यकाल फिर से एक साथ शुरू होगा और एक ही समय पर खत्म होगा, जो अनुच्छेद 83 के “रोटेशन” के सिद्धांत का उल्लंघन है।
इस संवैधानिक असमंजस के कारण, चुनाव आयोग इस मामले में उलझन में है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इस मुद्दे को सुलझाने के लिए राष्ट्रपति से परामर्श लिया जा सकता है, जो अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से कानूनी राय मांग सकते हैं।
उपराष्ट्रपति चुनाव और इसका प्रभाव
यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उप राष्ट्रपति चुनाव में सभी लोक सभा और राज्य सभा सदस्य मतदान करते हैं। जम्मू-कश्मीर की चार सीटें खाली होने से कुल 4 सांसदों के वोट कम हो गए हैं। यह लगातार दूसरी बार है जब उप राष्ट्रपति चुनाव में जम्मू-कश्मीर से कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: वर्तमान में उप राष्ट्रपति का पद जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद खाली हुआ है। उनका कार्यकाल अगस्त 2027 तक था। उपराष्ट्रपति चुनाव में विधायकों की नहीं, बल्कि सांसदों की वोटिंग होती है, इसलिए इन खाली सीटों से केवल वोटों की संख्या प्रभावित होती है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व न होना एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल खड़ा करता है।



