भारत का गौरव… शास्त्री, इंदिरा और अटल ने ऐसे दिखाई अमेरिका को औकात

अमेरिका बेशक टैरिफ से दबाव बनाने की कोशिश में है, लेकिन दिवंगत पीएम लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी व अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिकी दबाव को बखूबी नाकाम किया।

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नई दिल्ली: Trump Tariff : 7 अगस्त 2025 को अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद के लिए 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जिससे दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ गई है। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की हो। इतिहास में कई बार भारत ने अमेरिकी धमकियों को न केवल नाकाम किया, बल्कि अपनी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का परचम लहराया। लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक सूझबूझ से अमेरिका को भारत की ताकत का अहसास कराया। आइए, उन ऐतिहासिक पलों को याद करें जब भारत ने अमेरिकी दबाव को धूल चटाई।

1965: शास्त्री का ‘जय जवान, जय किसान’ का जवाब

1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत भयंकर खाद्य संकट से जूझ रहा था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी दी थी। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हार नहीं मानी। उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया और देशवासियों से एक समय का भोजन छोड़ने का आह्वान किया। इस अपील ने जनता को एकजुट किया और खाद्य आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाया। शास्त्री ने साफ कहा, “अमेरिका गेहूं रोके, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।” उनकी यह दृढ़ता ने अमेरिका को भारत की जनशक्ति का लोहा मनवाया।

1971: इंदिरा की कूटनीति ने तोड़ा अमेरिकी घमंड

1971 के भारत-पाक युद्ध में अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में तैनात किया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल इस धमकी को नजरअंदाज किया, बल्कि सोवियत संघ के साथ 1971 की मैत्री संधि करके अमेरिका को करारा जवाब दिया। इस कदम ने भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया और बांग्लादेश की आजादी में भारत की भूमिका को ऐतिहासिक बनाया। इंदिरा की दृढ़ता ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर किया, और 1974 के पोखरण-1 परमाणु परीक्षण ने भारत को वैश्विक मंच पर एक नई ताकत के रूप में स्थापित किया।

1998: अटल का परमाणु दांव

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने पोखरण-2 परमाणु परीक्षण किया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। अमेरिका ने इसकी कड़ी निंदा की और भारत पर हथियारों की बिक्री पर रोक, आर्थिक सहायता में कटौती और वैश्विक वित्तीय मदद में अड़चनें डालने जैसे प्रतिबंध लगाए। लेकिन भारत ने झुकने से इनकार कर दिया। वाजपेयी ने खुले तौर पर कहा कि ये परीक्षण पड़ोसी देशों से बढ़ते खतरे के मद्देनजर जरूरी थे। ऐसे में भारत ने कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए अमेरिका को समझाया कि उसकी नीतियां राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं। आखिरकार, अमेरिका को भारत के साथ रिश्तों को फिर से संतुलित करना पड़ा।

आज का भारत: ट्रंप के टैरिफ का जवाब

आज, जब ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर टैरिफ थोपा है, भारत अपनी स्वतंत्र नीति पर कायम है। एनएसए अजीत डोभाल ने मॉस्को में रूस के साथ गहरे रिश्तों की पुष्टि की, और पुतिन का आगामी भारत दौरा इस दोस्ती को और मजबूत करेगा। भारत का इतिहास बताता है कि वह दबाव में नहीं झुकता, बल्कि अपनी शर्तों पर वैश्विक मंच पर अपनी बात रखता है।

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