पटना: सीखने की कोई उम्र नहीं होती, यह कहावत बिहार के सुपौल की 56 वर्षीय सावित्री देवी ने सच कर दिखाई है। घर और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच, उन्होंने राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) से दसवीं की परीक्षा 65% अंकों के साथ पास की है। उनकी यह उपलब्धि उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जिन्हें बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। यह सब जीविका समूह में काम करते हुए ‘प्रथम’ संस्था के सहयोग से संभव हो पाया। सावित्री देवी की यह कहानी केवल एक परीक्षा पास करने की नहीं है, बल्कि यह दृढ़ संकल्प और शिक्षा की शक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
पृष्ठभूमि और प्रेरणा
सुपौल जिले की 56 वर्षीय सावित्री देवी एक सामान्य गृहिणी हैं, जो वर्षों से घर की जिम्मेदारियां निभा रही थीं। घर के काम के बाद, उन्होंने खुद को सशक्त बनाने के लिए जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का फैसला किया। समूह में उनके काम की लगन और ईमानदारी को देखते हुए उन्हें कई बार नेतृत्व करने के मौके मिले। हालांकि, कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वह हर बार जिम्मेदारी लेने से हिचकती थीं। उनके मन में हमेशा यह डर रहता था कि कहीं उनकी शैक्षणिक कमी उनके काम में बाधा न बन जाए। यह संकोच उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने से भी रोक रहा था।
‘प्रथम’ संस्था का सहयोग
सावित्री देवी की इस दुविधा को ‘प्रथम’ नामक एक गैर-सरकारी संस्था ने समझा। यह संस्था सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है। संस्था ने अपने ‘सेकेंड चांस’ प्रोग्राम के तहत उन महिलाओं को फिर से पढ़ाई से जोड़ने का काम किया, जिन्होंने किसी कारणवश बीच में ही अपनी शिक्षा छोड़ दी थी। सावित्री देवी को इस प्रोग्राम के बारे में पता चला और संस्था ने उन्हें राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) से 10वीं की परीक्षा के लिए फॉर्म भरने में मदद की।
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सफलता और भविष्य
सावित्री देवी ने इस मौके को गंभीरता से लिया। घर और समूह के काम के बाद जो भी समय मिलता, वह पढ़ाई में लगाती थीं। उनके इस जज्बे और कड़ी मेहनत का नतीजा यह रहा कि उन्होंने 10वीं की परीक्षा 65% अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। यह सिर्फ एक अंकपत्र नहीं, बल्कि उनके आत्मविश्वास की जीत है। उनकी सफलता ने न केवल उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त होने की दिशा में एक नया रास्ता दिखाया है, बल्कि सुपौल जिले की और भी कई महिलाओं को पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। उनकी यह कहानी साबित करती है कि सीखने और सफल होने की कोई उम्र नहीं होती, बस दिल में लगन और हौसला होना चाहिए।



