National Bone and Joint Day: हड्डियों और जोड़ों को स्वस्थ रखने के आसान उपाय

यह दिन न केवल हड्डियों की मजबूती और गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करता है, बल्कि इनके रोगों की रोकथाम और उपचार के किफायती तरीकों को भी बढ़ावा देता है।

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नई दिल्ली: हर साल 4 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय अस्थि एवं जोड़ दिवस (National Bone and Joint Day) मनाया जाता है, जिसका मकसद लोगों को हड्डियों और जोड़ों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है। यह दिन न केवल हड्डियों की मजबूती और गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करता है, बल्कि इनके रोगों की रोकथाम और उपचार के किफायती तरीकों को भी बढ़ावा देता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, खासकर उन लोगों के लिए जो घंटों डेस्क पर बैठकर काम करते हैं, हड्डियों और जोड़ों का स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे छोटे-छोटे बदलावों से आप अपनी हड्डियों और जोड़ों को मजबूत और स्वस्थ रख सकते हैं।

राष्ट्रीय अस्थि एवं जोड़ दिवस का महत्व
भारतीय अस्थि रोग संघ ने 4 अगस्त 2012 को पहली बार इस दिन को राष्ट्रीय अस्थि एवं जोड़ दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य हड्डियों और जोड़ों की अहमियत को रेखांकित करना और इनसे जुड़ी समस्याओं, जैसे ऑस्टियोपोरोसिस, गठिया और फ्रैक्चर, के प्रति जागरूकता फैलाना है। हड्डियां हमारे शरीर का ढांचा बनाती हैं, जो हमें गति, स्थिरता और महत्वपूर्ण अंगों की सुरक्षा प्रदान करती हैं। वहीं, जोड़ हमें लचीलापन और गतिशीलता देते हैं। इनकी देखभाल न करना न केवल शारीरिक कमजोरी का कारण बनता है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है।

ऑस्टियोपोरोसिस: एक मूक खतरा
ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है, जो हड्डियों के घनत्व और द्रव्यमान में कमी लाती है, जिससे हड्डियां कमजोर और भंगुर हो जाती हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, यह रोग भारत में व्यापक रूप से फैल रहा है और खासकर वयस्क पुरुषों व महिलाओं में कूल्हे, रीढ़ और कलाई के फ्रैक्चर का प्रमुख कारण है। ऑस्टियोपोरोसिस को मूक रोग भी कहा जाता है, क्योंकि इसके लक्षण तब तक स्पष्ट नहीं होते, जब तक हड्डी टूटने जैसी गंभीर स्थिति न आ जाए। विशेष रूप से महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद और बुजुर्गों में यह जोखिम ज्यादा होता है।

हड्डियों और जोड़ों को स्वस्थ रखने के उपाय
हड्डियों और जोड़ों की सेहत को बनाए रखने के लिए कुछ आसान लेकिन प्रभावी उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  • सही मुद्रा में बैठें: लंबे समय तक डेस्क पर काम करने वाले लोग अक्सर झुककर या गलत मुद्रा में बैठते हैं, जिससे रीढ़ की हड्डी पर दबाव पड़ता है। कार्यस्थल पर स्क्रीन को आंखों के स्तर पर रखें, पैरों को जमीन पर सपाट रखें और कोहनियों को 90 डिग्री के कोण पर बनाए रखें। हर घंटे में 5-10 मिनट के लिए खड़े होकर स्ट्रेचिंग करें ताकि मांसपेशियों और जोड़ों में अकड़न न आए।
  • विटामिन डी और कैल्शियम का सेवन: हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम और विटामिन डी जरूरी हैं। सूरज की रोशनी विटामिन डी का सबसे अच्छा स्रोत है, लेकिन बंद ऑफिसों में काम करने वालों में इसकी कमी आम है। दूध, दही, पनीर, हरी सब्जियां और मछली जैसे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी सप्लीमेंट लें।
  • नियमित व्यायाम: रोजाना 25-30 मिनट का व्यायाम, जैसे पैदल चलना, योग, वेट ट्रेनिंग या तैराकी, हड्डियों और जोड़ों को मजबूत बनाता है। वजन उठाने वाले व्यायाम हड्डियों के घनत्व को बढ़ाने में मदद करते हैं, जबकि योग जोड़ों की लचीलापन बनाए रखता है।
  • पर्याप्त पानी पिएं: जोड़ों में मौजूद साइनोवियल द्रव गतिशीलता और कुशनिंग के लिए जरूरी है। निर्जलीकरण से जोड़ों में अकड़न और दर्द बढ़ सकता है। दिन में 8-10 गिलास पानी पीना सुनिश्चित करें।
  • धूम्रपान और शराब से बचें: धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन हड्डियों के घनत्व को कम करता है और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ाता है। इनसे दूरी बनाए रखें।

कार्यस्थल पर ध्यान देने योग्य बातें

  • आधुनिक जीवनशैली में कार्यस्थल पर लंबे समय तक बैठे रहना हड्डियों और जोड़ों के लिए हानिकारक हो सकता है। कुछ छोटे बदलाव इसे बेहतर बना सकते हैं:
  • एर्गोनॉमिक फर्नीचर: कुर्सी और डेस्क को इस तरह से सेट करें कि रीढ़ सीधी रहे और जोड़ों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
  • विराम लें: हर 45-60 मिनट में खड़े होकर हल्की स्ट्रेचिंग करें। यह मांसपेशियों को रिलैक्स करता है और जोड़ों की अकड़न को कम करता है।
  • सूरज की रोशनी: यदि संभव हो, कुछ मिनट सूरज की रोशनी में बिताएं। यह विटामिन डी के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है।

जागरूकता और समय पर जांच
हड्डियों और जोड़ों की समस्याओं को रोकने के लिए समय-समय पर बोन डेंसिटी टेस्ट (DEXA स्कैन) करवाएं, खासकर 40 वर्ष की आयु के बाद। महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद और बुजुर्गों में नियमित जांच जरूरी है। यदि जोड़ों में दर्द, अकड़न या सूजन जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें।

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