परमाणु हमले के 80 साल बाद  निनोशिमा में अपनों के अवशेषों की तलाश जारी

परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया को एक बार आज से 80 साल पहले के विस्फोट पर नजर डालनी चाहिए। वहां आज भी हमले का दंश झेल रहे हैं।

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नई दिल्ली: 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा (Hiroshima) पर हुए दुनिया के पहले परमाणु हमले को 80 साल बीत चुके हैं, लेकिन इस त्रासदी का दर्द आज भी जिंदा है। हिरोशिमा से करीब 10 किलोमीटर दूर निनोशिमा द्वीप पर लोग अपने प्रियजनों के अवशेषों की तलाश में जुटे हैं। इस द्वीप पर उस भयावह हमले के बाद हजारों घायलों और मृतकों को लाया गया था, और आज भी यहां के लोग अपने परिजनों की यादों को जीवित रखने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं।

निनोशिमा: एक अस्थायी राहत केंद्र
1945 में परमाणु हमले के बाद निनोशिमा द्वीप को घायलों के इलाज और मृतकों के शवों को रखने के लिए एक अस्थायी केंद्र में तब्दील कर दिया गया था। जापान की नौसेना ने राहत और बचाव कार्यों का जिम्मा संभाला था। उस समय हजारों लोग इस द्वीप पर लाए गए, जिनमें से कई की हालत बेहद गंभीर थी। हमले की तीव्रता इतनी थी कि पीड़ितों की पहचान करना लगभग असंभव हो गया था। शरीर बुरी तरह झुलस चुके थे, कपड़े जल गए थे, और कई जगह मांस तक लटक रहा था।

सीमित चिकित्सा सुविधाओं का दंश
उस दौर में चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं। परमाणु हमले की भयावहता के सामने डॉक्टर और राहतकर्मी लगभग असहाय थे। अगस्त 1945 के अंत तक, यानी हमले के तीन सप्ताह बाद तक, केवल कुछ ही लोगों की जान बचाई जा सकी। बाकी मृतकों को निनोशिमा द्वीप पर ही जल्दबाजी में अलग-अलग स्थानों पर दफना दिया गया। इन दफन स्थलों की सटीक जानकारी न होने के कारण आज तक कई परिवार अपने परिजनों के अवशेषों की तलाश में भटक रहे हैं।

80 साल बाद भी उम्मीदें जिंदा
2025 में, हिरोशिमा परमाणु हमले की 80वीं बरसी पर, निनोशिमा में अवशेषों की खोज का कार्य जोरों पर है। हिरोशिमा विश्वविद्यालय के शोधकर्ता रेबुन काओ पिछले सात वर्षों से इस दिशा में काम कर रहे हैं। 2018 से अब तक वे लगभग 100 हड्डियों के टुकड़े खोज चुके हैं, जिनमें एक शिशु का जबड़ा भी शामिल है। काओ और उनकी टीम न केवल अवशेषों की खोज कर रहे हैं, बल्कि पीड़ितों के सम्मान में फूल चढ़ाकर और प्रार्थना करके उनकी स्मृति को जीवित रख रहे हैं।

एक दर्दनाक इतिहास की स्मृति
हिरोशिमा का परमाणु हमला मानव इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक है। निनोशिमा द्वीप उस दर्द का मूक गवाह है, जहां हजारों लोगों ने अपनी अंतिम सांस ली। आज, 80 साल बाद भी, पीड़ितों के परिवार वाले और शोधकर्ता इस उम्मीद में द्वीप की मिट्टी खोद रहे हैं कि शायद उन्हें अपने प्रियजनों का कोई निशान मिल जाए। यह तलाश न केवल अवशेषों की खोज है, बल्कि उन लोगों की स्मृतियों को सहेजने का प्रयास भी है, जिन्होंने इस त्रासदी में सब कुछ खो दिया। निनोशिमा की यह कहानी दुनिया को याद दिलाती है कि युद्ध और विनाश का दर्द पीढ़ियों तक गूंजता रहता है। यह एक ऐसी मिसाल है, जो मानवता को शांति और सौहार्द की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।

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