स्वदेशीः अपने लिये जिये तो क्या जिये, तू जी ऐ दिल देश के लिये

केंद्रीय कृषि मंत्री का मानना है कि आम लोग घर की जरूरत का सामान खरीदते वक्त स्वदेशी को प्राथमिकता दें। इसके लिए वह देश के लिए जीने की अपील भी कर रहे हैं।

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नई दिल्ली:
अपने लिये जिये तो क्या जिये,
तू जी ऐ दिल जमाने के लिये

1966 में आई फिल्म बदल के गाने की इस लाइन को आधार बनाकर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वदेशी उत्पाद को अपनाने की अपील है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 2.11 मिनट के वीडियो में उन्होंने कहा, ‘प्रिय बहनों और भाइयों-भांजे और भांजियों, “अपने लिए तो सब जीते हैं, कीट-पतंगे भी, पशु-पक्षी भी जीते हैं। अपने लिए जिए तो क्या जिए… तू जी के ए दिल अपने देश के लिए। देश के लिए जीना कल माननीय प्रधानमंत्री जी ने हमें सिखाया है।’ कल उन्होंने अपील की, हम अपने घर में लगने वाला हर सामान, कोई भी वस्तु जिसकी हमारे घर पर जरूरत है, वो अपने देश में बनी हुई ही खरीदें।’

प्रधानमंत्री मोदी ने भी थी अपील
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अगस्त को वाराणसी से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की 20वीं किस्त के वितरण के अवसर पर स्वेदशी उत्पाद खरीदने की अपील की थी। उसके बाद केंद्रीय कृषि मंत्री ने दोबारा से प्रधानमंत्री और सरकार की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताते हुए अपील को दोहराया।

144 करोड़ की आबादी वाला बाजार है
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वही उत्पाद खरीदें- जो अपने गांव में बनते हों। पास के शहर में बनते हों। अपने जिले में बनते हो। प्रदेश में बनते हों। अपने देश में बनते हों। भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। आज हम चौथे स्थान पर हैं जल्द ही हम तीसरे स्थान पर पहुंच जाएंगे। हमारा देश 144 करोड़ की आबादी वाला बड़ा बाजार है। 

मजबूत होगी अर्थव्यवस्था
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अगर हम ठान लें कि हमारे देश में बनी चीजें ही खरीदेंगे और उन्हीं का उपयोग करेंगे तो चाहे हमारे किसान हों, छोटे-छोटे निर्माता हों, स्वयं सहायता समूह हों, आस-पास सामान बनाने वाले भाई-बहन हों उनकी आमदनी बढ़ेगी। उनकी आमदनी बढ़ेगी तो हमारी अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी।

हमारा पैसा विदेश में क्यों जाए
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हमारा पैसा विदेश में क्यों जाए? जो हमारे बच्चों को ही रोजगार दे। मैं भी देश के लिए जिऊंगा और आप भी देश के लिए जियो… मतलब देश में बना सामान ही खरीदो।

आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहे ये ब्रैंड
भारत की आत्मनिर्भरता सिर्फ एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि एक सतत आंदोलन है – जिसकी जड़ें स्वतंत्रता संग्राम में हैं और शाखाएं आज के नवभारत की ओर फैल रही हैं। अमूल, पारले, मारुति, डाबर, सिप्ला, हीरो और अन्य ब्रांड न केवल उत्पाद हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के जीवंत प्रतीक हैं।

  • अमूलः 1946 में किसानों द्वारा शुरू किया गया यह सहकारी आंदोलन डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में भारत की श्वेत क्रांति बना। आज अमूल 80,000 करोड़ रुपये के कारोबार के साथ दुनिया में भारत की डेयरी ताकत का प्रतीक है।
  • पारलेः 1929 में शुरू हुआ पारले, 1939 में बना भारत का पहला ग्लूकोज़ बिस्कुट। आज पारले-जी हर महीने एक अरब से अधिक पैकेट बेचता है और देश का सबसे लोकप्रिय एफएमसीजी ब्रांड है।
  • मारुतिः 1983 में आई मारुति 800 ने आम भारतीय के लिए कार को सपना नहीं, हकीकत बनाया। यह भारत के मध्यम वर्ग की सामाजिक और आर्थिक यात्रा का प्रतीक बनी।
  • डाबरः1884 में डॉ. एस.के. बर्मन द्वारा स्थापित डाबर ने आयुर्वेद को वैज्ञानिक आधार दिया। आज इसके 380+ उत्पाद स्वास्थ्य और पोषण में अग्रणी हैं।
  • बाटाः हालांकि विदेशी ब्रांड, 1931 से भारत में मौजूद बाटा भारतीयों के जीवन में रच-बस गया। इसकी 99.99 रुपए वाली “बाटा रेट” रणनीति आज भी याद की जाती है।
  • सिप्लाः डॉ. यूसुफ हमीद के नेतृत्व में सिप्ला ने दवाओं को किफायती और सुलभ बनाया। पेटेंट कानूनों में बदलाव में इसकी प्रमुख भूमिका रही।
  • हीरोः 1956 में साइकिल से शुरू होकर, हीरो ने दोपहिया वाहनों में क्रांति लाई। ‘स्प्लेंडर’ और ‘पैशन’ जैसे मॉडल्स आज हर घर में हैं।

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