नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट (High Court) ने अपने एक हालिया फैसले में स्पष्ट किया है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने और बाद में उससे विवाह करने का प्रयास अपराध की गंभीरता को कम नहीं करता। अदालत ने एक 34 वर्षीय व्यक्ति की जमानत याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। इस मामले में आरोपी पर 16 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बार-बार यौन शोषण और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है। यह मामला भारतीय दंड संहिता की दुष्कर्म संबंधी धाराओं और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किया गया है।
मामले का विवरण
शिकायत के अनुसार, आरोपी ने नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में उसे अपने साथ ले गया। मृतका की बहन ने आरोप लगाया कि लड़की लगभग दो महीने की गर्भवती थी और आरोपी द्वारा लगातार शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के कारण उसने आत्महत्या कर ली। अभियुक्त ने अपनी याचिका में दावा किया कि उसका नाबालिग के साथ संबंध सहमति पर आधारित था और दोनों के बीच कथित विवाह हुआ था, जिसके कारण गर्भधारण भी सहमति से हुआ। उसने यह भी तर्क दिया कि मृतका की उम्र 19 वर्ष थी, न कि 16।
अदालत का फैसला
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि नाबालिग के साथ कथित विवाह कानूनी रूप से अमान्य है और इसे दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने पाया कि आरोपी की उम्र (34 वर्ष) पीड़िता की तुलना में दोगुनी से अधिक थी, जिससे शोषण और अनुचित प्रभाव की आशंका बढ़ती है। खासकर तब, जब पीड़िता आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से थी।
न्यायमूर्ति ने कहा, “आरोपी और पीड़िता के बीच उम्र का अंतर न केवल शारीरिक है, बल्कि यह शक्ति और प्रभाव का असंतुलन भी दर्शाता है। ऐसी स्थिति में सहमति की कोई भी धारणा भ्रामक है।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतका की उम्र को लेकर विवाद का समाधान मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा, न कि जमानत याचिका के स्तर पर।
आत्महत्या और अपराध की गंभीरता
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मृतका द्वारा आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने के पीछे आरोपी का कथित दुर्व्यवहार एक प्रमुख कारण हो सकता है। इसने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया। न्यायमूर्ति ने कहा कि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और आरोपी के भागने का जोखिम, साथ ही नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को रोकने में सार्वजनिक हित को देखते हुए, जमानत देना उचित नहीं है।
सामाजिक और कानूनी निहितार्थ
हाईकोर्ट का यह फैसला नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों के प्रति समाज और कानून की गंभीरता को रेखांकित करता है। यह संदेश देता है कि नाबालिग के साथ विवाह का दावा अपराध को वैध नहीं बना सकता। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक जागरूकता बढ़ाने और कमजोर वर्गों के शोषण को रोकने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।



