नई दिल्ली: दुनियाभर में हर सेकंड बिजली गिरने से औसतन 10 पेड़ (Trees) नष्ट हो रहे हैं, यानी हर घंटे 36,000 से अधिक पेड़ इस प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ रहे हैं। म्यूनिख की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस शोध में पहली बार एक ऐसा वैश्विक मॉडल विकसित किया गया है, जो बिजली गिरने से पेड़ों को होने वाले नुकसान का सटीक आकलन करता है। निष्कर्षों के अनुसार, हर साल लगभग 30 करोड़ पेड़ बिजली की मार से खत्म हो रहे हैं, जो वैश्विक वनस्पति नुकसान का करीब 3% है।
केवल बिजली से होने वाला नुकसान शामिल
यह आंकड़ा उन पेड़ों को नहीं गिनता जो जंगल की आग से नष्ट होते हैं। अध्ययन में केवल बिजली के सीधे प्रहार से मरने वाले पेड़ों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नुकसान पृथ्वी के कार्बन संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। यह शोध ग्लोबल चेंज बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पहले इस तरह के नुकसान का अध्ययन सीमित क्षेत्रों तक ही हुआ था, लेकिन इस नए मॉडल ने वैश्विक स्तर पर बिजली के प्रभाव को समझने में मदद की है।
नया मॉडल बताता है नुकसान का दायरा
शोधकर्ताओं ने एक उन्नत गणितीय मॉडल बनाया, जो बिजली गिरने के पैटर्न और वैश्विक वनस्पति डेटा को जोड़कर यह अनुमान लगाता है कि कितने पेड़ हर साल इस आपदा से खत्म हो रहे हैं। यह मॉडल न केवल मृत पेड़ों की संख्या बताता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कौन से क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और इसका कार्बन भंडारण और जंगलों की संरचना पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन के मुताबिक, बिजली से मरने वाले पेड़ों के सड़ने से हर साल लगभग 100 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में उत्सर्जित हो रहा है। यह उत्सर्जन जंगल की आग से होने वाले जीवित पौधों के जलने से उत्सर्जित 120 करोड़ टन CO2 के बराबर है।
जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा खतरा
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बिजली गिरने की घटनाएं भविष्य में और बढ़ सकती हैं। वर्तमान में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया सबसे अधिक प्रभावित हैं, लेकिन मॉडल बताते हैं कि यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी एशिया जैसे मध्यम और उच्च अक्षांशों वाले क्षेत्रों में भी यह खतरा बढ़ेगा। इन क्षेत्रों में शीतोष्ण और बोरियल जंगल पहले से ही सूखे, गर्मी और कीटों की समस्याओं से जूझ रहे हैं। चूंकि इन क्षेत्रों में पेड़ धीरे बढ़ते हैं, बिजली से हुए नुकसान की भरपाई में दशकों लग सकते हैं।
पर्यावरणीय संकट के रूप में बिजली
शोध के प्रमुख वैज्ञानिक ने कहा कि बिजली गिरना अब एक अनदेखा पर्यावरणीय संकट बन चुका है। यह न केवल जंगलों की जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि वैश्विक कार्बन चक्र को भी प्रभावित कर रहा है। इस खतरे को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर जंगलों की निगरानी और संरक्षण के उपायों को और मजबूत करने की जरूरत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बिजली गिरने के प्रभावों को समझना और उससे निपटने की रणनीति बनाना बेहद जरूरी है।



