नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के हालिया फैसलों ने उनके सहयोगी देशों के बीच अविश्वास की भावना को जन्म दिया है। पहले भारत के साथ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का साथ देने और अब ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते की प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा को रद्द करने का फैसला, ट्रंप की विदेश नीति पर सवाल उठा रहा है।
ताइवान के राष्ट्रपति लैटिन अमेरिका के देशों-पराग्वे, ग्वाटेमाला और बेलीज-के दौरे के लिए न्यूयॉर्क और डलास में रुकना चाहते थे, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने चीन के दबाव में इसकी अनुमति नहीं दी। यह कदम ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक वार्ताएं चल रही हैं। इस घटनाक्रम ने क्वॉड देशों-भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया-में चिंता बढ़ा दी है, जो अमेरिका पर अपनी सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी के लिए निर्भर हैं।
ताइवान यात्रा पर रोक और चीन का दबाव
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने पराग्वे, ग्वाटेमाला और बेलीज की यात्रा के दौरान अमेरिका में रुकने की योजना बनाई थी, जो ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने वाले देश हैं। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने न्यूयॉर्क और डलास में उनके रुकने की अनुमति नहीं दी। यह फैसला चीन के कड़े विरोध के बाद लिया गया, जो ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और अमेरिका-ताइवान के बीच किसी भी आधिकारिक संपर्क का विरोध करता है।
ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन ट्रंप की नीतियां इस प्रतिबद्धता पर सवाल उठा रही हैं। ताइवान के राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि लाई फिलहाल ताइवान में हाल के तूफान से निपटने और अमेरिका के साथ व्यापारिक वार्ताओं पर ध्यान दे रहे हैं, और उनकी कोई तत्काल विदेश यात्रा की योजना नहीं है।
ट्रंप की नीति: व्यापारिक सौदों को प्राथमिकता
ट्रंप प्रशासन और चीन के बीच तनावपूर्ण व्यापार युद्ध चल रहा है, जिसमें टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंध जैसे मुद्दे शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने ताइवान के राष्ट्रपति की यात्रा को मंजूरी न देकर चीन के साथ व्यापारिक वार्ताओं को प्राथमिकता दी है। सोमवार को स्टॉकहोम में दोनों देशों के अधिकारियों ने व्यापारिक मुद्दों पर चर्चा की। ट्रंप की यह रणनीति उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत वह वैश्विक प्रभाव को कम करने और घरेलू आर्थिक हितों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हालांकि, यह कदम अमेरिका के सहयोगियों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, जो अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं।
क्वॉड देशों में बढ़ता अविश्वास
ट्रंप के इस फैसले ने क्वॉड देशों-भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया-में चिंता बढ़ा दी है। ये देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। जापान अपने सैन्य बजट में भारी वृद्धि कर रहा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में चीन के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कदम उठाए हैं। भारत भी चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की नीतियां क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका फायदा चीन और रूस जैसे देश उठा सकते हैं। दक्षिण कोरिया भी अमेरिका से अपने सैन्य अड्डों की वापसी पर चर्चा कर रहा है, जो क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का संकेत है।
ताइवान पर चीन का बढ़ता दबाव
चीन ने हाल के वर्षों में ताइवान के खिलाफ सैन्य और राजनयिक दबाव बढ़ाया है। वह लगातार सैन्य अभ्यास कर रहा है और ताइवान के आसपास अपने युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों को तैनात कर रहा है। बीजिंग का दावा है कि ताइवान उसका हिस्सा है और वह बल प्रयोग करके भी इसे अपने नियंत्रण में ले सकता है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई ने चीन को “विदेशी शत्रु शक्ति” करार दिया है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 17 उपायों की घोषणा की है, जिसने बीजिंग को और भड़का दिया है। ट्रंप के ताजा कदम को बीजिंग के दबाव के आगे झुकने के रूप में देखा जा रहा है, जिससे ताइवान और अन्य सहयोगी देशों में अमेरिका की प्रतिबद्धता पर संदेह पैदा हो रहा है।
भविष्य की आशंकाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की नीतियां वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव ला सकती हैं। उनकी ताइवान नीति को क्षेत्र में अमेरिका के प्रभाव को कम करने की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। क्वॉड देश अब अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर रहे हैं, क्योंकि अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अब क्षेत्रीय सहयोग और स्वतंत्र रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान दे सकते हैं। ट्रंप का यह कदम न केवल ताइवान के लिए, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो भविष्य में नई भू-राजनीतिक चुनौतियों को जन्म दे सकता है।



