नई दिल्ली: पाकिस्तान में धार्मिक और आस्था-आधारित अल्पसंख्यक समुदायों (Pakistan Religious Minorities) पर बढ़ते हमलों और भेदभाव को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक पैनल ने सख्त प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों ने सरकार से तुरंत जांच शुरू करने, दोषियों को सजा दिलाने और मौलिक सुधार लागू करने की मांग की है ताकि देश में धार्मिक स्वतंत्रता (Pakistan Religious Intolerance) सुनिश्चित की जा सके।
संयुक्त राष्ट्र के इस पैनल ने हाल ही में एक बयान जारी कर पाकिस्तान में जारी हमलों पर हैरानी जताई है। उनका कहना है कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार (Minorities in Pakistan) के मामले बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन अपराधियों को रोकने के बजाय एक ‘दंडमुक्ति का माहौल’ बना हुआ है, जो स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
किसने जताई चिंता?
यह बयान ऐसे समय आया है जब एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएं भी पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों-जैसे अहमदिया, ईसाई, हिंदू और शिया-के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठा चुकी हैं। उनकी रिपोर्टों में 2025 में ईशनिंदा के आरोपों को लेकर भड़की हिंसा को “अल्पसंख्यकों के खिलाफ उग्र आतंक” बताया गया है।
अहमदिया समुदाय बना निशाना
विशेष रूप से अहमदिया मुसलमानों के साथ हो रहा व्यवहार चिंता का विषय बना हुआ है। 1974 से गैर-मुस्लिम घोषित किए जा चुके इस समुदाय को न तो खुलकर अपने धर्म का पालन करने की आजादी है और न ही वे अपने पूजा स्थलों को मस्जिद कह सकते हैं। रिपोर्टों में मस्जिदों के अपमान, कब्रिस्तानों में तोड़फोड़ और धार्मिक ग्रंथों को जलाए जाने जैसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।
अल्पसंख्यक लड़कियों के खिलाफ अपराध
सिर्फ धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि लिंग के आधार पर भी अल्पसंख्यक लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, हिंदू, ईसाई और सिख लड़कियों—जिनमें कई की उम्र 12 वर्ष से भी कम है—का अपहरण कर जबरन मतांतरण और निकाह की घटनाएं सामने आई हैं।
संयुक्त राष्ट्र की अपील
पैनल ने पाकिस्तान (Pakistan) से अपील की है कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए गंभीर कदम उठाए। जांच और अभियोजन प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के साथ-साथ कानूनों में ऐसे बदलाव किए जाएं जो सभी नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा कर सकें।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकारों को लेकर उसकी छवि सवालों के घेरे में है। अब देखना होगा कि पाकिस्तान सरकार इस अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच क्या ठोस कदम उठाती है।



