नई दिल्ली: भारतीय टेस्ट टीम के युवा कप्तान शुभमन गिल (Shubman Gill) के लिए इंग्लैंड दौरा (England vs India) अब तक किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा है। मैनचेस्टर टेस्ट (Manchester Test) फिलहाल जारी है, लेकिन पहले तीन मुकाबलों में से सिर्फ एक में मिली जीत के बाद सीरीज पर पकड़ कमजोर हो गई है।
अगर मौजूदा मैच में भी परिणाम भारत के पक्ष में नहीं आता, तो बतौर कप्तान गिल की शुरुआत एक हार के साथ दर्ज होगी।टीम के कमजोर प्रदर्शन के पीछे रणनीति की कुछ खामियों के अलावा दो खिलाड़ियों की विफलता भी चर्चा का विषय बनी हुई है। माना जा रहा है कि कप्तान गिल भविष्य में इन दोनों को मौका देने से परहेज कर सकते हैं।
करुण नायर की नाकामी बनी सिरदर्द
करीब आठ साल बाद भारतीय टीम में वापसी करने वाले करुण नायर (Karun Nair) को इस सीरीज में नई शुरुआत करने का सुनहरा अवसर मिला। हालांकि तीन मैचों में मात्र 131 रन और एक बार शून्य पर आउट होकर उन्होंने निराश किया। उनकी औसत 21 और स्ट्राइक रेट 52 जैसी रही। नतीजा यह हुआ कि मैनचेस्टर टेस्ट से पहले उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह युवा बल्लेबाज साई सुदर्शन को शामिल किया गया।
हालांकि घरेलू क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड संतोषजनक रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिले इस बड़े मौके को भुनाने में उनकी असफलता ने उनके भविष्य को अनिश्चित बना दिया है।
प्रसिद्ध कृष्णा की गेंदबाजी बनी सवालिया निशान
दूसरे खिलाड़ी प्रसिद्ध कृष्णा (Prasidh Krishna) को भी कप्तान गिल (Shubman Gill) ने मौका दिया। आईपीएल में शानदार प्रदर्शन के चलते वह चयनकर्ताओं की नजरों में आए, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में वह अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके। दो मैचों में उन्होंने 62 ओवर में केवल 6 विकेट लिए और 331 रन लुटाए। उनकी इकॉनमी रेट 5 से ऊपर रही, जो टेस्ट प्रारूप में स्वीकार्य नहीं मानी जाती।
अब तक के करियर में प्रसिद्ध ने पांच टेस्ट में 14 विकेट लिए हैं, लेकिन लगातार महंगे साबित हो रहे हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि कप्तान गिल अगली सीरीज में उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर रख सकते हैं।
आगे की रणनीति पर नजरें
भारतीय टीम (Team India) फिलहाल पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रही है और शुभमन गिल को कप्तान के तौर पर भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है। ऐसे में टीम चयन में बदलाव और प्रयोग जरूरी हो गए हैं। इन दोनों खिलाड़ियों का खराब प्रदर्शन एक बार फिर यह सवाल उठता है कि क्या अनुभव से ज्यादा फॉर्म को तवज्जो दी जानी चाहिए?



