सेवानिवृत्त पत्रकारों की पेंशन बढ़ाने का किसको मिलेगा फायदा!

125 युनिट बिजली फ्री देने, सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाने के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीडियाकर्मियों की पेंशन राशि बढ़ाने का एलान किया है। बिहार के पत्रकार बिदारदी की इस पर प्रतिक्रिया क्या है, पटना से बता रहे हैं, एस.के.उल्लाह, गुड्डू...

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पटना: बिहार में विधानसभा चुनावों की चल रही तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों की पेंशन राशि बढ़ाने की भी घोषणा की है। सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सीएम द्वारा की गई ताजी घोषणा के पूर्व उन्होंने बिहार के घरेलु बिजली उपभोक्ताओं को125 युनिट बिजली फ्री देने और सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने वालों की माहवारी रकम को 400 रुपये से बढ़ाकर 1100 रुपये कर देने का भी ऐलान किया था। चुनावी वर्ष में एक के बाद एक की जा रही ऐसी घोषणाओं के कारणों-प्रभावों पर लगातार चर्चा जारी है।
ऐलान यह था कि पेंशन प्राप्त करने वाले सेवानिवृत्त पत्रकारों को 6 हजार रुपये की जगह 15 हजार रुपये मिलेंगे। इसके अलावा मृत्यु की स्थिति में पेंशन पाने वाले पत्रकार की पत्नी या पति को गुजारे के लिए 3 हजार रुपये से बढ़ाकर दस हजार रुपये दिए जाएंगे। सीएम ने यह भी कहा कि पत्रकारों की यह पेंशन इसलिए बढ़ाई जा रही है ताकि वह अच्छे से अपना और परिवार का जीवन निर्वाह कर सकें। बिहार में पत्रकार सम्मान पेंशन स्कीम वर्ष 2019 से लागू की गई है। देश के असम, झारखंड और हरियाणा आदि राज्यों में भी पत्रकारों के हित के लिए योजनाएं चलायी जा रही हैं।

डेढ़ सौ साल पुराना है बिहार की पत्रकारिता का इतिहास 
लोकतंत्र की जननी के रूप में चिंहित बिहार में पत्रकारिता का इतिहास करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। वर्ष 1872 में बिहार बंधु नामक हिन्दी का पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ था। दो साल बाद 1874 में टाइम्स ऑफ इंडिया का पटना संस्करण भी पाठकों के हाथ में आया था। जाहिर है समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरु होने के साथ ही पत्रकार भी प्रकट हुए।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार के अखबारों और पत्रकारों की भूमिका को भी सराहा गया था। राज्य के कई राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों से भी बिहार की पत्रकारिता और पत्रकारों का गहरा जुड़ाव रहा। कई तरह के परिवर्तनों में भी बिहारी पत्रकारों की भूमिका अतुलनीय साबित हुई। खासकर महिलाओं, किसानों, छात्रों और वंचित वर्ग के लोगों की जीवन दशा में परिवर्तन की भी बिहार की पत्रकारिता साक्षी रही है। 

पत्रकार सम्मान पेंशन स्कीम के लिए कौन होंगे पात्र पत्रकार
राज्य के सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग की मान्यता कमिटी सेवानिवृति के बाद पेंशन स्कीम के लिए पत्रकारों का चयन करती है। इसके नियम कठोर हैं। पेंशन पाने के लिए पत्रकार को बिहार का निवासी होने के साथ उसके पास 20 वर्ष का सवैतनिक पत्रकारीय अनुभव भी होना चाहिए। जाहिर है आवेदक के पास नियुक्ति पत्र की मौजूदगी भी अपेक्षित है। यहीं पर पेच है। ज्यादातर अखबार या इलेक्ट्रिानिक मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को कोई नियुक्ति पत्र नहीं देते हैं। संविदा दस्तावेजों में भी उनके पत्रकार होने की बातें साफ साफ नहीं होती हैं।

14 करोड़ की आबादी वाले बिहार में हैं कितने पेंशनधारी पत्रकार 
बिहार और झारखंड में कई बड़े अखबारों में उप संपादक और समाचार संपादक जैसे पदों पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार और पटना स्थित रामजी मिश्र मनोहर फाउंडेशन के सचिव ज्ञानवर्धन मिश्र कहते हैं कि बिहार में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या मुश्किल से 50-60 के करीब है। ऐसे में मुख्यमंत्री की इस घोषणा से 14 करोड़ की आबादी वाले सूबे में जान जोखिम में डालकर काम करने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रिोनिक मीडिया के लाखों पत्रकारों के खुश होने का तो कोई कारण नहीं है। उन्हें इसका कोई फायदा नहीं होने वाला है।
सेवानिवृत्त और लब्ध प्रतिष्ठ पत्रकार का कहना है कि मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने के नियम इतने कड़े और जटिल हैं कि जिला और राज्य स्तर पर प्रमुख समाचार संस्थानों में काम करने वाले धुरंधर पत्रकारों को भी राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त करने में पसीने छूट जाते हैं। उसकी वजह यह है कि समाचार संस्थान ज्यादातर पत्रकारों को नियुक्ति पत्र तक नहीं देते हैं। बीस-पच्चीस साल के अनुभव के बावजूद पत्रकारों को दिए गए संविदा पत्र में उनके पत्रकार होने का जिक्र भी नहीं होता। जबकि बिहार के सभी 38 जिलों के अलावा 534 प्रखंडों में सूबे के बड़े अखबारों के संवाददाता काम कर रहे हैं। मुफस्सिल के पत्रकारों को तो साप्ताहिक छुट्टी भी नहीं मिलती है। दिन-रात काम करने और कई महत्वपूर्ण एवेंट और घटनाओं को कवर करने के बावजूद उन्हें जिंदगी भर पत्रकार होने का दर्जा नहीं मिलता है।

पत्रकारों को कैसे मिलेगा पेंशन स्कीम का लाभ 
बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और जम्मू कश्मीर आदि राज्य के बड़े अखबारों में समाचार संपादक और सहायक संपादक के ओहदे से सेवानिवृत हुए देश के प्रमुख पत्रकार विजय नारायण सिंह कहते हैं कि बिहार में पत्रकारों को पेंशन देने के लिए लगाई गई मान्यता प्राप्त पत्रकार होने की शर्त को ही हटाना चाहिए। तभी श्रमजीवी पत्रकारों को इसका लाभ मिल सकेगा। कठिन शर्तों के कारण वास्तव में बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़कर पत्रकारिता करने वाले और अपनी रिपोर्टों के जरिए समाजिक-आर्थिक बदलाव लाने वाले अधिकांश पत्रकार ऐसे लाभ से वंचित रह जाते हैं। जबकि छोटे, अनाम और फर्जी प्रसार आंकड़ों वाले कई अखबारों के पत्रकार मान्यता प्राप्त पत्रकार बन जाते हैं।
चंद वर्ष पूर्व बिहार के बालिका गृह कांड के आरोपित ब्रजेश ठाकुर के खिलाफ चल रही जांच के दौरान पाया गया था कि वह एक अल्पज्ञात दैनिक प्रात: कमल के पत्रकार के रूप में भी अपनी पहचान रखते थे। देश में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां छोटे-छोटे अखबार से जुड़े पत्रकार मान्यता प्राप्त हैं, जबकि अपनी लेखनी और पत्रकारीय कर्म से तहलका मचाने वाले पत्रकारों को सरकारी मान्यता नहीं मिली। इसलिए सरकार को नियमों की सरलता के साथ ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि पत्रकारिता कर्म करने वाले अधिकांश लोगों को सरकार की पेंशन योजना का लाभ मिल सके। 

पत्रकारों की पहचान के लिए गठित हो आयोग, नियम हों सरल 
गया जिले में एक प्रमुख न्यूज एजेंसी के पत्रकार के रूप में करीब बीस साल का अनुभव रखने वाले एक प्रमुख पत्रकार सूर्य प्रताप श्रीकांत कहते हैं कि समाचार संस्थानों के दांव पेच वाले रवैये के कारण वर्ष 2007 में गठित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का अधिकांश पत्रकारों को कोई लाभ नहीं मिल सका। मान्यता पाने के कठोर और अव्यावहारिक नियमों के कारण सेवाकाल में भी अभावों में जीने वाले वास्तविक पत्रकारों को सेवानिवृति के बाद भी मुफलिसी का सामना करना पड़ता है।
पत्रकारों का मानना है कि प्रमुख प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों को पेंशन स्कीम के दायरे में लाने से पहले उनकी पहचान के लिए आयोग का गठन किया जाना चाहिए। आयोग के समक्ष प्रिंट मीडिया में काम करने वाले पत्रकार यदि नामोल्लेख के साथ छपी अपनी रिपोर्टें या इलेक्ट्रिानिक मीडिया में प्रसारित हुई रिपोर्टों की क्लिप प्रस्तुत करें तो उन्हें मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा दिया जाना चाहिए। दावे के लिए प्रस्तुत की जाने वाली छपी हुई रिपोर्टों या प्रसारित रिपोर्टों की संख्या समुचित ढंग से तय की जा सकती है।

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