नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी उपराष्ट्रपति का पद किसी सहयोगी दल को देने के मूड में नहीं है। यह लगभग तय भी हो गया है। ऐसा इसिलए भी है कि यह उपराष्ट्रपति के पास उच्च सदन यानी राज्सभा संचालन की अहम जिम्मेदारी होती है लिहाजा पार्टी इस पद के लिए किसी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है।
भाजपा की योजना इस पद पर संविधान की बेहतर समझ और बेहतर छवि वाले व्यक्तित्व को आसीन करने की है। जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफे के बाद भावी रणनीति और नए उपराष्ट्रपति के संबंध में पीएम ने मैराथन बैठक की थी। पीएम के स्वदेश लौटने के बाद अगले हफ्ते नामों पर विचार होने की उम्मीद है।
राष्ट्रपति बनाने के लिए भाजपा के सामने सहयोगियों को साधे रखने के अतिरिक्त कोई बड़ी चुनौती नहीं है। वर्तमान में राज्यसभा में 240 लोकसभा में 543 (कुल 783 सदस्य) हैं। इस हिसाब से बहुमत का आंकड़ा 392 (प्रथम वरीयता मत) है। भाजपा के पास लोकसभा में 240 और राज्यसभा में 99 सदस्य हैं। पार्टी को 10 मनोनीत सदस्यों का समर्थन हासिल है। ऐसे में पार्टी के पास 349 सदस्य हैं। यह आंकड़ा जीत के लिए जरूरी समर्थन से महज 43 कम है। सहयोगियों को जोड़ दें तो यह संख्या 400 से ज्यादा है।
चुनावी संदेश देने की संभावना नहीं
पार्टी सूत्रों ने बताया कि न तो यह पद किसी सहयोगी को दिया जाएगा और न ही इसके जरिए योजना कोई चुनावी संदेश की है। ऐसे में चुनावी राज्य बिहार के सीएम नीतीश कुमार या बिहार के किसी नेता को इस आशय की जिम्मेदारी दिए जाने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है। इस पद के लिए पार्टी ऐेसे व्यक्तित्व की तलाश में है जिन्हें संविधान की बेहतर समझ हो। संभवत: अगले सप्ताह तक इस बारे में सहमति बन जाएगी।
अपने पास पद रखने का क्या है कारण?
उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं। उच्च सदन की कार्यवाही संचालन कि जिम्मेदारी उनके पास ही होता है। ऐसे में भाजपा इस पद को सहयोगी को नहीं देने वाली है। पार्टी ने राज्यसभा में उपसभापति का पद सहयोगी जदयू को पहले ही दिया है। लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद खाली है। ऐसे में अगर मोलभाव हुआ तो लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद किसी सहयोगी के हिस्से में जाने की सभावना हो सकती है। सूत्रों की माने तो भाजपा अध्यक्ष की बुधवार को रामनाथ ठाकुर से मुलाकात सिर्फ औपचारिक थी।



