निशांत के जन्मदिन पर लगे सियासी कयास… कहीं सीएम के सियासी उत्तराधिकारी तो नहीं?

लंबे समय से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत कुमार ने रविवार 44 वां जन्मदिन मनाया। इस मौके पर पिता से आशीर्वाद लेने की तस्वीरें भी वायरल हुईं। जदयू कार्यालय में केक काटकर खुशियां मनाई गईं। इससे कयास लगने शुरू हो गए कि कहीं सीएम अपनी सियासी जमीन निशांत कुमार को नहीं सौंप रहे हैं। पटना से राहुल प्रताप सिंह की रिपोर्ट...

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पटना: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले 20 वर्षो से बिहार की सत्ता के कुर्सी पर काबिज हैं। सीएम की पार्टी जदयू में फिलहाल परिवार लोग शामिल नहीं है। उन्होंने खुद और पार्टी को परिवारवाद की राजनीति से दूर रखा है। सियासत के शुरुआती दिनों से सीएम का नजरिया परिवारवाद के खिलाफ रहा है।
पल-पल बदलने वाली बिहार की सियासत में इस बार निशांत कुमार का क्या होने वाला है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन जदयू का एक खेमा अभी से निशांत कुमार को सियासत में सक्रिय करने का हामी है। यहां तक कि कई नेता दबी जुबान में कहते हैं कि उनको पार्टी नेतृत्व स्वीकार कर चाहिए।

कभी सियासी मंच पर नहीं आए निशांत 
निशांत कुमार ने फिलहाल खुद को राजनीति से कोसो दूर रखा है। कभी उन्हें नीतीश कुमार के राजनीतिक मंच पर नहीं देखा गया है। फिर भी, निशांत ने अपने पिता को वोट करने की अपील करते रहे हैं। कई बार उन्होंने नीतीश कुमार के कामों की सहारना भी की है।

तेजस्वी ने भी किया है निशांत कुमार का स्वागत 
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश के बेटे निशांत कुमार राजनीति में आने की बात पर जब सवाल किया गया तो उनका भी मानना था-अगर निशांत राजनीति में आते हैं तो अच्छी बात है। हम उनका स्वागत करते हैं। जदयू शरद यादव ने बनाई थी, लेकिन अब दूसरी विचारधारा के लोग इस पार्टी को हाइजैक करना चाहते हैं, तो अच्छा है कि अगर निशांत आएं तो पार्टी के लिए बेहतर होगा। निशांत कुमार को ही बिहार का सीएम बना दें।
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देबी कहती हैं कि नीतीश कुमार से बिहार संभल नहीं रहा है इसलिए अब अपने बेटे निशांत कुमार को ही बिहार का सीएम बना दें। वह युवा नेता हैं, अच्छे से बिहार को संभालेंगे ।

जदयू बचाने के लिए निशांत की सक्रियता मानी जा रही जरूरी 
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उम्र के 71 वें पड़ाव पर है। ऐसे में जदयू कों अपना एक उत्तराधिकारी का चयन होना जरूरी है। जदयू में चर्चा यह चल रही है कि निशांत कुमार होली के बाद सक्रिय राजनीति में शामिल हो सकते हैं। यह सिर्फ नीतीश कुमार से हरी झंडी मिलने की बात है। पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से निशांत के राजनीति में आने की लगातार बढ़ती मांग की जानकारी नीतीश कुमार को दी गई है। सियासी गलियारे में चर्चा यह भी होती है कि अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तरफ से हरी झंडी मिलती है तो निशांत नालंदा जिले की हरनौत विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार हो सकते हैं।

बीटेक निशांत का झुकाव अध्यात्म की ओर ज्यादा 
बीआईटी मेसरा से बीटेक की पढ़ाई करने वाले निशांत कुमार का झुकाव शुरू से अध्यात्म की ओर रहा है। 20 जुलाई रविवार को निशांत अपने जन्मदिन पर पटना के महावीर मंदिर पूजन-पाठ किया। कई मौके पर उनको अध्यात्म से जुड़ी बातें करते सुना गया। पत्रकारों के राजनीति में आने के सवाल पर निशांत ने जवाब में कई बार कहा है कि उनकी दिलचस्पी अध्यात्म में है, राजनीति में नहीं। हालांकि, वह कई बार अपने पिता नीतीश कुमार के काम-काज की तारीफ कर चुके है। बता दें कि 2007 में अपनी मां मंजू सिन्हा के निधन के बाद से निशांत लगातार अपने पिता के साथ मुख्यमंत्री निवास में ही रहते हैं और आवास में आये लोगो से मिलते रहते हैं।

उपेंद्र कुशवाहा ने भी किया निशांत को राजनीति में लाने का आग्रह 
कभी जदयू के सदस्य रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री सह राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने भी निशांत के जन्मदिन पर बधाई देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से एक विशेष आग्रह किया। सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर पोस्ट करके लिखा, आज बड़े भाई नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत का जन्मदिन है। इस खुशी के इस अवसर पर जदयू की नई उम्मीद निशांत को जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। ईश्वर उसे हमेशा स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त रखें।
कुशवाहा ने आगे लिखा है कि नीतीश कुमार को समय और परिस्थिति की नजाकत को समझते हुए इस सच को स्वीकार करना चाहिए कि अब सरकार और पार्टी दोनों का (साथ-साथ) संचालन स्वयं उनके लिए भी उचित नहीं है। सरकार चलाने का उनका लंबा अनुभव है, जिसका लाभ राज्य को आगे भी मिलता रहे, यह फिलहाल राज्य हित में अतिआवश्यक है। परन्तु पार्टी की जवाबदेही के हस्तांतरण (जो मेरी ही नहीं, उनकी पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं व नेताओं की भी राय है) के विषय पर समय रहते ठोस फैसला ले लें। यही उनके दल के हित में है। और इसमें विलंब दल के लिए अपूर्णीय नुकसान का कारण बन सकता है। शायद ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई कभी हो भी नहीं पाये।

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