नई दिल्ली: संविधान का अनुच्छेद 68 का पहला भाग सामान्य अवस्था में यानि कार्यकाल पूरा होने के बाद उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की बात करता है। अनुच्छेद 68 (1) कहता है कि कार्यकाल पूरा होने से पहले नए उपराष्ट्रपति का चुनाव हो जाना है। जबकि इसका दूसरा भाग अचानक से पद खाली होने के बाद की स्थिति पर रोशनी डालता है। इसमें पद का खाली होना इन हालातों पर निर्भर करता है;
- उपराष्ट्रपति की असामयिक मौत हो जाए, जैसा कि 2002 में उपराष्ट्रपति कृष्णकांत के साथ हुआ था।
- पद से इस्तीफा दे दें, जैसा 1969 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए किया और अब स्वास्थ्य वजहाें से मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कर रहे हैं।
- राज्य सभा में अविश्वास प्रस्ताव लाकर पद से हटा दिया जाए, ऐसा अभी कभी नहीं हुआ है।
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने 11 अगस्त 2022 को शपथ ली थी। इनका कार्यकाल 2027 तक था। लेकिन इस्तीफा दे देने से जो पद रिक्त होने वाला है, वह आकस्मिक ही है। आकस्मिक रिक्ति पर दो बातें ध्यान रखने वाली हैं; पहली, यथाशीघ्र निर्वाचन कराना होगा। और दूसरी यह कि इस पद निर्वाचित व्यक्ति अपना पदभार संभालने के बाद पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा करेगा। मतलब यह कि अगर अचानक से उपराष्ट्रपति का पद खाली होता है तो जितनी जल्दी संभव हो, चुनाव करवाया जाएगा। वहीं, उस चुनाव में जो भी चुनकर आए, वह पूरे पांच साल पर पद पर रहने का हकदार होगा। ऐसा नहीं है कि पुराने उपराष्ट्रपति के बचे कार्यकाल में ही उसकाे इस जिम्मेदारी को निभाना है।
यूं होता उपराष्ट्रपति का निर्वाचन
संविधान का अनुच्छेद 324 देश के चुनाव आयोग काे उपराष्ट्रपति के चुनाव प्रक्रिया की देखरेख, निर्देशन व नियंत्रण का अधिकार देता है। इसमें निर्वाचन अधिकारी संसद के किसी भी सदन का महासचिव होता है। जो भी व्यक्ति उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहता है, उसके लिए न्यूनतम 20 संसद सदस्य प्रस्तावक होने चाहिए और इतने ही के समर्थन से नामित होना भी अपेक्षित है। मतलब यह कि 40 सांसदों का समर्थन उपराष्ट्रपति के इच्छुक व्यक्ति को जुटा लेना अनिवार्य है; 20 प्रस्तावक व 20 अनुमाेदक। इस पद के लिए जमानत राशि 15,000 रुपये है।
इसके साथ ही उम्मीदवार को इन बातों पर भी खरा उतरना होगा; उम्र 35 साल, भारत का नागरिक, राज्य सभा के सदस्य बनने की योग्यता। साथ में केंद्र व राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण या किसी दूसरे सार्वजनिक प्राधिकरण के लाभ के पदों पर न बैठा हो।
उपराष्ट्रपति का निर्वाचन अनुच्छेद 66 के हिसाब से यह लोग कर सकते हैं; राज्य सभा के निर्वाचित व मनोनीत सदस्य और लोक सभा के निर्वाचित सदस्य। और हर मतदाता के एक वोट की कीमत एक ही होती है। राष्ट्रपति के चुनाव की तरह इसमें राज्यवार फर्क नहीं पड़ता। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव नियम 1974 के हिसाब से वोटिंग संसद भवन में होगी।
इस तरह होती मतगणना
चुनाव में जितने वोट पड़े हैं, पहले उनको जोड़ लिया जाता है। फिर, इसको दो से डिवाइड यानि भाग देते हैं। जो भी अंक आता है, उसमें एक जोड़ना होता है। अब यह जो अंक आया, वही कोटा होता है। मतलब यह कि जीतने वाले प्रत्याशी को इतना वोट लाना होगा।
चूंकि उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति है तो वोट देते समय वोटर अपनी पसंद के अनुसार उम्मीदवार को 1,2,3… की प्राथमिकता पर नंबर देता है। जो सबसे ज्यादा पसंद, उसे एक नंबर और जो सबसे कम, उसे सबसे निचले पायदान वाला नंबर दिया जाता है।
गणना शुरू होने के बाद तब-तक चलती रहती है, जब तक कोई उम्मीदवार कोटा वाले अंक को न छू जाए। जो सबसे ज्यादा वोट लाने के साथ कोटे तक पहुंच जाता है, उसे जीता माना जाता है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि वोट ट्रांसफर कैसे होता है?
सबसे पहले तो यह देखते हैं कि पहले राउंड में कोई प्रत्याशी कोटे तक पहुंच सका है या नहीं। पहुंचने पर तो गिनती बंद हो जाती है और नियत प्रत्याशी जीत जाता है। लेकिन अगर कोई भी कोटे तक वहां तक नहीं पहुंच सका है तो पहली प्राथमिकता में जिस प्रत्याशी को सबसे कम वोट मिले होते हैं, उसको चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया जाता है। और उसे दूसरी प्राथमिकता पर मिले वोट को दूसरे उम्मीदवार के खाते में डाल दिया जाता है। इसके बाद फिर कोटे से मिलान किया जाता है। अगर यहां भी कोई नहीं सका तो दूसरे राउंड में फिर से एक नंबर की प्राथमिकता में सबसे कम वोट पाने वाला बाहर हो जाता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक कोई एक प्रत्याशी जीत के जादुई आंकड़े को छू नहीं लेता। इसमें कहीं से भी कोई विवाद होने पर सुप्रीम कोर्ट फैसला करता है। संविधान का अनुच्छेद-71 इसका ब्योरा देता है।
यह होती उपराष्ट्रपति की शपथ…
“मैं, __________________ईश्वर की शपथ लेता हूं/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूं उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूंगा।”



