ऑस्ट्रेलिया से 900 साल पुरानी मूर्तियां आ रही हैं भारत वापस

भारत की प्राचीन और अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर एक और बड़ी जीत मिली है। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार भारतीय मूल की तीन प्राचीन और ऐतिहासिक कलाकृतियों को भारत को वापस सौंपने जा रही है। तमिलनाडु मूल की ये तीनों मूर्तियां 11वीं और 12वीं शताब्दी (चोल राजवंश के काल) की हैं, जिन्हें दशकों पहले अवैध रूप से देश से बाहर ले जाया गया था। अब कूटनीतिक प्रयासों और आपसी सम्मान के तहत इन्हें बहुत जल्द भारत वापस लाया जाएगा।

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नई दिल्ली : भारत की प्राचीन और अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर एक और बड़ी जीत मिली है। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार भारतीय मूल की तीन प्राचीन और ऐतिहासिक कलाकृतियों को भारत को वापस सौंपने जा रही है। तमिलनाडु मूल की ये तीनों मूर्तियां 11वीं और 12वीं शताब्दी (चोल राजवंश के काल) की हैं, जिन्हें दशकों पहले अवैध रूप से देश से बाहर ले जाया गया था। अब कूटनीतिक प्रयासों और आपसी सम्मान के तहत इन्हें बहुत जल्द भारत वापस लाया जाएगा। वापस आने वाली तीनों कलाकृतियां कला और इतिहास के लिहाज से अनमोल हैं। ये करीब 900 से 1000 साल पुरानी हैं और भारतीय शिल्पकला के स्वर्ण युग को दर्शाती हैं:

पवित्र नंदी की पत्थर की मूर्ति (11वीं-12वीं शताब्दी): भगवान शिव के वाहन और उनके परम भक्त नंदी की यह भव्य मूर्ति पत्थर को तराशकर बनाई गई है।

भद्रकाली की छवि वाला धातु का त्रिशूल (11वीं शताब्दी): यह एक ऐतिहासिक धातु का त्रिशूल है, जिसके केंद्र में देवी भद्रकाली की बेहद खूबसूरत और सूक्ष्म छवि उकेरी गई है।

छह सिर वाले कार्तिकेय की मूर्ति (12वीं शताब्दी): भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय (जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन भी कहा जाता है) की यह मूर्ति पत्थर से बनी है, जिसमें उनके छह सिरों (षडमुख) को बेहद बारीकी से दिखाया गया है।

    आखिर क्यों वापस आ रही हैं ये मूर्तियां?

    इन मूर्तियों की वतन वापसी के पीछे भारत सरकार का कड़ा रुख और दोनों देशों के मजबूत होते रिश्ते हैं। इसके मुख्य रूप से दो कारण हैं:

    अवैध तस्करी और चोरी के खिलाफ भारत का अभियान

    ऐतिहासिक रूप से ये तीनों मूर्तियां तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों का हिस्सा थीं। दशकों पहले इन्हें मूर्तिकारों या तस्करों द्वारा अवैध रूप से चुराकर देश से बाहर बेच दिया गया था। भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से यूनेस्को (UNESCO) के नियमों के तहत दुनिया भर के संग्रहालयों से अपनी चोरी हुई कलाकृतियों को वापस लाने के लिए एक विशेष अभियान चला रही है। जब इन मूर्तियों के भारत के होने के पुख्ता प्रमाण पेश किए गए, तो ऑस्ट्रेलिया इन्हें लौटाने के लिए तैयार हो गया।

    सभ्यता और कूटनीति का अनूठा आदान-प्रदान

    यह केवल मूर्तियों की वापसी नहीं है, बल्कि दो देशों के बीच आपसी सम्मान की एक मिसाल है। जहाँ ऑस्ट्रेलिया भारत को उसकी धरोहर सौंप रहा है, वहीं भारत भी चेन्नई संग्रहालय में सालों से रखे ऑस्ट्रेलिया के ‘फर्स्ट नेशंस’ (वहां के मूल आदिवासी समुदाय) के एक पूर्वज के अवशेषों को पूरे सम्मान के साथ ऑस्ट्रेलिया को वापस कर रहा है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भारत के इस कदम का दिल से स्वागत किया है।

    कब तक होगी इनकी घर वापसी?

    विदेश मंत्रालय ने बताया है कि कागजी और कूटनीतिक औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। इन तीनों अमूल्य कलाकृतियों को ‘उचित समय पर’ यानी बहुत जल्द पूरे सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ हवाई मार्ग से भारत लाया जाएगा। भारत आने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इनकी स्थिति की जांच करेगा और फिर इन्हें इनके मूल स्थान यानी तमिलनाडु के संग्रहालयों या मंदिरों में स्थापित किया जाएगा।

    निष्कर्ष

    अपनी खोई हुई विरासत को वापस पाना किसी भी देश के लिए गर्व का क्षण होता है। यह इस बात का सबूत है कि आज वैश्विक मंच पर भारत की बात को कितनी गंभीरता से सुना जाता है। ये मूर्तियां सिर्फ पत्थर या धातु के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि हमारे पूर्वजों की आस्था और कला की जीती-जागती कहानियां हैं, जो अब आखिरकार अपने घर लौट रही हैं।

    Meenu Rautela

    Meenunewwork@gmail.com

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