नई दिल्ली: भारत में खेती को हमेशा ‘मॉनसून का जुआ’ कहा जाता है। इस साल भी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत ने देश के करोड़ों किसानों और सरकार की धड़कनें बढ़ा दी थीं। जून के महीने में उम्मीद से बहुत कम बारिश हुई, जिसके पीछे ‘अल नीनो’ (El Niño) के उभरते खतरे को जिम्मेदार माना जा रहा है। लेकिन, घबराने की जरूरत नहीं है! भारत सरकार इस बार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, केंद्र सरकार ने ‘प्रोएक्टिव’ यानी समय से पहले जागकर एक ऐसी मजबूत रणनीति तैयार की है, जो हमारे अन्नदाताओं को इस मौसमी संकट से सुरक्षित निकाल सके।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में एक हाई-लेवल रिव्यू मीटिंग (उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक) के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए देश को एक राहत भरी खबर दी और साथ ही सरकार की पूरी प्लानिंग का खाका सामने रखा। आइए, बहुत ही आसान शब्दों में समझते हैं कि पूरा मामला क्या है और सरकार किसानों के लिए क्या कदम उठा रही है।
1. जून का सूखा और जुलाई की राहत: ताजा आंकड़े क्या कहते हैं?
शुरुआत थोड़ी चिंताजनक थी। जून के महीने में देश में सामान्य से 33% कम बारिश दर्ज की गई थी। इस भारी कमी की वजह से देश के 262 जिले सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे थे। लेकिन जुलाई की शुरुआत के साथ ही मॉनसून ने करवट बदली है।
- Deficit (कमी) में सुधार: जून में जो बारिश की कमी 33% थी, वह जुलाई के शुरुआती हफ्तों में सुधरकर 24% पर आ गई है। यानी मॉनसून तेजी से रिकवर कर रहा है।
- जिलों की स्थिति सुधरी: अच्छी बारिश के चलते देश के प्रभावित (कम बारिश वाले) जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 रह गई है।
- इन राज्यों पर है पैनी नजर: कृषि मंत्री ने बताया कि सरकार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे प्रमुख राज्यों की स्थिति पर हर हफ्ते बारीकी से नजर (Weekly Reviews) रख रही है। उम्मीद है कि जुलाई में बारिश और बढ़ेगी, जिससे खरीफ फसलों की बुआई में तेजी आएगी।
2. बुआई पर असर और सरकार की ‘क्रॉप एडवाइजरी’ (फसल सलाह)
देरी से आए मॉनसून का सीधा असर हमारी खरीफ (गर्मी के मौसम की) फसलों पर पड़ा है।
- कम हुई बुआई: इस साल अब तक कुल 350.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ की बुआई हो चुकी है। यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 91.95 लाख हेक्टेयर कम है।
- कौन सी फसलें प्रभावित हुईं?: पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर सोयाबीन और कपास (कॉटन) की बुआई पर पड़ा है, क्योंकि इन्हें शुरुआती दौर में अच्छे पानी की जरूरत होती है।
सरकार की सलाह (Alternative Crops)
अगर मॉनसून में देरी हो गई है, तो किसानों को नुकसान से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने नई सलाह दी है। सरकार ने किसानों से कहा है कि वे उन पारंपरिक फसलों के पीछे न भागें जिन्हें ज्यादा पानी चाहिए। इसकी जगह वे कम समय में उगने वाली और कम पानी लेने वाली फसलें लगाएं, जैसे:
- मक्का (Maize)
- बाजरा (Bajra)
- मूंग (Moong)
3. सरकार की चौतरफा रणनीति: ‘खेत बचाओ अभियान’ से लेकर बीज बैंक तक
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ किया कि सरकार ने इस संकट का अंदाजा अप्रैल महीने में ही लगा लिया था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के साथ मिलकर देश के संभावित प्रभावित जिलों के लिए पहले ही ‘आकस्मिक योजना’ (Contingency Plans) तैयार कर राज्यों को सौंप दी गई थी।
जमीन पर किए गए बड़े प्रयास:
- खेत बचाओ अभियान: जून के महीने में देश भर में 1.24 लाख से अधिक जागरूकता और सहायता कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिसके जरिए 80 लाख से ज्यादा किसानों तक सीधा संपर्क साधा गया और उन्हें कम पानी में खेती के गुर सिखाए गए।
- नेशनल सीड रिजर्व (राष्ट्रीय बीज बैंक): अगर किसी वजह से किसानों की पहली बुआई खराब हो जाती है, तो उन्हें दोबारा बुआई के लिए भटकना न पड़े, इसके लिए सरकार ने 1.75 लाख क्विंटल बीजों का आपातकालीन रिजर्व तैयार रखा है।
- पैसों की तंगी होगी दूर (Kisan Credit Card): किसानों को खाद-बीज खरीदने में दिक्कत न हो, इसके लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) अभियान को बहुत तेज कर दिया गया है। 30 जून तक प्राप्त 1.14 लाख आवेदनों में से 94,000 से अधिक आवेदनों को तुरंत मंजूरी दे दी गई है।
- फसल बीमा का सुरक्षा कवच: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत ज्यादा से ज्यादा किसानों को जोड़ा जा रहा है ताकि अगर मौसम की मार से फसल खराब भी हो जाए, तो किसानों को उसका पूरा मुआवजा मिल सके और वे कर्ज के जाल में न फंसें।
4. अल नीनो क्या है? मॉनिटरिंग के लिए बनीं स्पेशल टीमें
आम भाषा में समझें तो अल नीनो (El Niño) प्रशांत महासागर की एक ऐसी भौगोलिक घटना है, जिसके कारण समुद्र का पानी गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है और इसके कारण भारत में अक्सर मॉनसून कमजोर हो जाता है या सूखा पड़ता है।
इस अदृश्य खतरे से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम (निगरानी तंत्र) एक्टिव किया है:
- El Niño Monitoring Cell: यह सेल हर दिन अल नीनो के व्यवहार और उसके असर को ट्रैक करता है।
- Crop Weather Watch Group: यह ग्रुप मौसम और फसलों की सेहत पर नजर रखता है।
- स्टेट लेवल कंट्रोल रूम: राज्यों के साथ मिलकर 24 घंटे काम करने वाले कंट्रोल रूम बनाए गए हैं।
यह पूरी टीम मॉनसून की प्रगति, फसलों की बुआई की स्थिति और यहां तक कि बाजार में अनाज के दामों (Market Trends) पर भी नजर रख रही है ताकि जरूरत पड़ने पर सरकार तुरंत हस्तक्षेप (Intervention) कर सके।
5. इतिहास और तुलनात्मक विश्लेषण: पहले और अब में क्या बदला?
अगर हम भारतीय कृषि के इतिहास पर नजर डालें, तो अल नीनो हमेशा से भारत के लिए एक बड़ा विलाप लेकर आता था।
पुराना इतिहास (1987, 2002 और 2014-15 का दौर):
- अतीत में जब भी अल नीनो का असर होता था, तो देश में हाहाकार मच जाता था। 1987 या 2002 के सूखा काल में सरकारें तब जागती थीं जब फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती थीं।
- पहले कोई ‘डिजिटल सीड रिजर्व’ नहीं था, न ही रियल-टाइम वेदर सैटेलाइट डेटा था। किसानों को रेडियो या अखबारों से बहुत देरी से सूचनाएं मिलती थीं।
- फसल बीमा की प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि किसानों को सालों साल मुआवजा नहीं मिलता था, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती थी।
वर्तमान ट्रेंड्स (2026 की आधुनिक कृषि रणनीति):
- रिएक्टिव से प्रोएक्टिव (पहले ही तैयारी): आज का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार संकट आने का इंतजार नहीं करती। अप्रैल 2026 में ही योजना बना ली गई थी, जबकि मॉनसून जून में आना था।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण और टेक्नोलॉजी: अब आईसीएआर (ICAR) के वैज्ञानिक ब्लॉक स्तर पर मिट्टी की नमी और मौसम का सटीक अनुमान लगाकर ‘शॉर्ट-ड्यूरेशन’ फसलों (जैसे बाजरा, मूंग) की सलाह सीधे किसानों के मोबाइल पर भेज रहे हैं।
- वित्तीय सुदृढ़ता: पहले किसान साहूकारों के पास जाते थे, आज 94,000 से अधिक केसीसी (KCC) लोन महज कुछ हफ्तों में मंजूर कर दिए गए।
| पैमाना | पुराना दौर (Past Trends) | वर्तमान दौर – 2026 (Current Trends) |
| रणनीति | संकट आने के बाद राहत कार्य (Reactive) | संकट आने से 2 महीने पहले प्लानिंग (Proactive) |
| बीज उपलब्धता | कमी होने पर कालाबाजारी | 1.75 लाख क्विंटल का नेशनल सीड रिजर्व तैयार |
| किसानों तक पहुंच | बहुत सीमित और धीमी | ‘खेत बचाओ अभियान’ से 80 लाख किसानों से सीधा संवाद |
| निगरानी | कागजी और बिखरी हुई | अल नीनो सेल और क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप द्वारा डिजिटल मॉनिटरिंग |
निष्कर्ष: हौसला और तैयारी ही जीत की कुंजी है
मौसम पर किसी का बस नहीं है, लेकिन सही तैयारी से उसके नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है। सरकार ने बीज के इंतजाम से लेकर, वित्तीय मदद (KCC), फसल बीमा (PMFBY) और २४ घंटे चलने वाले कंट्रोल रूम के जरिए यह साबित कर दिया है कि वह देश के अन्नदाताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। जुलाई की सुधरती बारिश इस बात का संकेत है कि अगर हम सही और वैज्ञानिक तरीके से कम पानी वाली फसलों को अपनाएं, तो अल नीनो के इस खतरे को भी मात दी जा सकती है।



