वैज्ञानिकों ने खोजीं शांत पड़ी आकाशगंगाओं में छिपी हुई ब्लैक होल की दुनिया

अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की एक टीम ने, जिसमें भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (IIA) की डॉ. अरु बेरी शामिल हैं, उच्च-रिज़ॉल्यूशन (High-Resolution) रेडियो दूरबीन तकनीक का उपयोग करके हमारे ब्रह्मांड की पास की आकाशगंगाओं में छिपे हुए शांत और कम सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होल (Supermassive Black Holes) की एक बहुत बड़ी आबादी का पता लगाया है। ये ब्लैक होल इतने धुंधले ('faint') और शांत हैं कि ये सामान्य और पारंपरिक दूरबीनों से पूरी तरह अदृश्य बने हुए थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये छिपे हुए राक्षस भले ही शांत दिखते हों, लेकिन ये रेडियो जेट और ऊर्जा के जरिए अपनी पूरी आकाशगंगा के वातावरण, नए तारों के जन्म और उसके पूरे जीवनचक्र (Evolution) को बदलने की ताकत रखते हैं।

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नई दिल्ली: हमारा ब्रह्मांड अनंत रहस्यों से भरा हुआ है। रात के अंधेरे में आसमान में टिमटिमाते हुए तारे और घूमती हुई आकाशगंगाएं (Galaxies) जितनी सुंदर दिखती हैं, उनके केंद्र में उतने ही खौफनाक और रहस्यमयी राज दफन होते हैं। विज्ञान जगत में हमेशा से यह माना जाता रहा है कि ब्रह्मांड की लगभग हर बड़ी आकाशगंगा के बिल्कुल बीचों-बीच यानी उसके दिल में एक महाविशालकाय ब्लैक होल (Supermassive Black Hole) मौजूद होता है। लेकिन मुसीबत यह थी कि इनमें से अधिकांश ब्लैक होल अत्यधिक धुंधले, शांत और निष्क्रिय अवस्था में हैं। वे किसी हिंसक राक्षस की तरह चमकते नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें देख पाना या उनकी मौजूदगी का ठोस सबूत जुटाना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा से एक बहुत बड़ी चुनौती रहा है।

लेकिन अब, साल 2026 में विज्ञान ने एक बहुत बड़ी छलांग लगाई है। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत आने वाले एक स्वायत्त संस्थान, भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (IIA) की फैकल्टी सदस्य डॉ. अरु बेरी और उनके साथ काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने ब्रह्मांड के इस सबसे गहरे सन्नाटे को तोड़ दिया है। उन्होंने एक अभूतपूर्व रेडियो सर्वे के जरिए हमारे स्थानीय ब्रह्मांड (Local Universe) में मौजूद सामान्य और साधारण दिखने वाली आकाशगंगाओं के भीतर छिपे हुए इन शांत ब्लैक होल की पूरी फौज को ढूंढ निकाला है।

क्या होते हैं ये ‘फेंट’ ब्लैक होल और इन्हें खोजना क्यों था मुश्किल?

इससे पहले कि हम इस महान खोज की गहराइयों में उतरें, हमारे लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर ‘फेंट’ (Faint या धुंधले) ब्लैक होल क्या होते हैं।

जब हम ब्लैक होल का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में एक ऐसी छवि बनती है जो अपने आसपास की हर चीज को, यहाँ तक कि रोशनी को भी निगल जाती है। जब कोई ब्लैक होल बहुत तेजी से गैस, धूल और तारों को निगल रहा होता है, तो उसके चारों तरफ घर्षण के कारण बहुत ज्यादा गर्मी और तेज रोशनी पैदा होती है। इन्हें विज्ञान की भाषा में ‘एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लीआई’ (AGN) या क्वासर्स कहा जाता है। इन्हें खोजना आसान होता है क्योंकि ये ब्रह्मांड में दीये या सर्चलाइट की तरह चमकते हैं।

लेकिन हर ब्लैक होल हमेशा भूखा या हिंसक नहीं होता। वर्तमान ब्रह्मांड में अधिकांश ब्लैक होल ‘डाइट’ पर हैं, यानी उन्हें निगलने के लिए बहुत कम मात्रा में गैस और पदार्थ मिल रहे हैं। ऐसे ब्लैक होल को ‘कम सक्रिय या कम संचय करने वाले’ (Weakly Accreting) ब्लैक होल कहा जाता है। चूंकि ये बहुत कम मात्रा में पदार्थ निगलते हैं, इसलिए इनसे निकलने वाली रोशनी या ऊर्जा इतनी कम होती है कि वे पूरी तरह धुंधले (Faint) पड़ जाते हैं।

पुरानी दूरबीनें जब इन आकाशगंगाओं के केंद्र को देखती थीं, तो वे ब्लैक होल की इस हल्की सी आहट को पहचान नहीं पाती थीं। इसके अलावा, आकाशगंगा के केंद्र में लाखों नए तारे बन रहे होते हैं और पुराने तारे टूट रहे होते हैं। इस तारों की भारी चमक-दमक के पीछे ब्लैक होल की यह धीमी सी रेडियो आवाज पूरी तरह दब जाती थी। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे किसी बेहद शोर-शराबे वाले बाजार में कोई व्यक्ति बहुत धीमी आवाज में फुसफुसा रहा हो।

e-MERLIN रेडियो एरे: वह जादुई चश्मा जिसने धुंधलापन साफ किया

इस ऐतिहासिक खोज को मुमकिन बनाने का श्रेय जाता है e-MERLIN (इलेक्ट्रॉनिक मल्टी-एलिमेंट रेडियो लिंक्ड इंटरफेरोमीटर नेटवर्क) नाम के एक बेहद शक्तिशाली और उन्नत रेडियो टेलिस्कोप एरे को। यह कोई एक अकेली दूरबीन नहीं है, बल्कि कई रेडियो दूरबीनों का एक विशाल नेटवर्क है जो आपस में मिलकर एक बहुत बड़ी और सुपर-सेंसिटिव दूरबीन की तरह काम करता है।

वैज्ञानिकों की टीम ने इस e-MERLIN नेटवर्क का रुख पृथ्वी के पड़ोस में स्थित 280 आकाशगंगाओं की तरफ किया। इन आकाशगंगाओं को प्रसिद्ध ‘पालोमार सैंपल’ (Palomar Sample) से चुना गया था, जो खगोल विज्ञान में आकाशगंगाओं का एक बहुत ही सुपरिभाषित और प्रामाणिक डेटाबेस माना जाता है।

वैज्ञानिकों का मकसद इन 280 आकाशगंगाओं के केंद्र के बिल्कुल अंदरूनी हिस्से को ‘पारसेक’ (Parsec Scale) के स्तर पर देखना था। पारसेक अंतरिक्ष को मापने की एक इकाई है (एक पारसेक लगभग 3.26 प्रकाश वर्ष के बराबर होता है)। इतने छोटे और बारीक पैमाने पर अंतरिक्ष को देखना इंसानी इतिहास में पहली बार मुमकिन हो पाया था।

खोज के चौंकाने वाले आंकड़े

जब e-MERLIN से मिले डेटा का विश्लेषण किया गया, तो वैज्ञानिकों के होश उड़ गए:

  1. एक-चौथाई आकाशगंगाओं में हलचल: अध्ययन की गई कुल 280 आकाशगंगाओं में से लगभग 25% (एक-चौथाई) के ठीक केंद्र से अत्यधिक सघन और मजबूत रेडियो तरंगें (Compact Radio Emission) निकलती हुई पाई गईं।
  2. पकड़े गए छिपे हुए दानव: ये रेडियो तरंगें इस बात का सीधा सबूत थीं कि उन शांत और साधारण दिखने वाली आकाशगंगाओं के दिल में वास्तव में सुपरमैसिव ब्लैक होल छिपे बैठे हैं जो बहुत ही धीमी गति से सक्रिय हैं।
  3. संरचनाओं का खुलासा: खोजे गए इन धुंधले स्रोतों में से अधिकांश बहुत ही छोटे और सघन बिंदु की तरह दिखाई दिए। हालांकि, कुछ ब्लैक होल ऐसे भी थे जो अपने अंदर से ‘रेडियो जेट’ (Radio Jets) उगल रहे थे। ये जेट कई पारसेक की दूरी तक अंतरिक्ष में फैले हुए थे, जो यह दिखाते हैं कि शांत दिखने के बावजूद इनके अंदर कितनी भयानक ऊर्जा छिपी हुई है।

इतिहास और विकास: पहले की कमियाँ बनाम आज की आधुनिक क्रांति (Comparative Analysis)

विज्ञान कभी भी एक दिन में तरक्की नहीं करता। आज मिली यह सफलता दशकों की असफलताओं, पुरानी तकनीकों की सीमाओं को समझने और उनमें सुधार करने का परिणाम है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम आसानी से समझ सकते हैं कि इस खोज ने खगोल विज्ञान के इतिहास को कैसे बदल कर रख दिया है:

तुलना का मुख्य आधारभूतकाल का दौर (Past Historical Trends)वर्तमान आधुनिक दौर (Current 2026 Trends)
दूरबीनों की क्षमता और रिज़ॉल्यूशनपहले की रेडियो दूरबीनों में ‘एंगुलर रिज़ॉल्यूशन’ (Angular Resolution) की भारी कमी थी। वे आकाशगंगा के केंद्र को इतनी बारीकी से ज़ूम नहीं कर पाती थीं।e-MERLIN जैसी आधुनिक तकनीकों के कारण आज हम पारसेक स्केल पर जाकर आकाशगंगाओं के केंद्रों का एक्सरे जैसी साफ तस्वीर देख सकते हैं।
भ्रम बनाम स्पष्टताअतीत में वैज्ञानिक इस बात को लेकर हमेशा भ्रमित रहते थे कि केंद्र से आने वाली धुंधली रोशनी ब्लैक होल की है या वहां नए तारों के जन्म (Star Formation) अथवा मरे हुए तारों के मलबे (Supernova Remnants) की है।आज मल्टी-वेवलेंथ (Multi-wavelength) दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जिससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि आ रही तरंगें केवल और केवल ब्लैक होल की ही हैं।
डेटा का दायरा और पक्षपातपहले के अध्ययन या तो बहुत छोटी आबादी पर होते थे या केवल उन आकाशगंगाओं पर केंद्रित होते थे जो पहले से बहुत चमकीली थीं, जिससे परिणाम पूरी तरह सटीक नहीं आते थे।इस बार पालोमार सैंपल की 280 आकाशगंगाओं का उपयोग किया गया है। यह सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह से संपूर्ण (Statistically Complete) और निष्पक्ष अध्ययन है।
ब्लैक होल के विकास का सिद्धांतपहले माना जाता था कि ब्लैक होल केवल तभी बढ़ते हैं जब वे बड़े पैमाने पर हिंसक रूप से पदार्थों को निगलते हैं और चमकते हैं।वर्तमान खोज से साबित हुआ है कि ब्रह्मांड में ब्लैक होल के बढ़ने का सबसे मुख्य और आम तरीका उनका ‘शांत और धीमा’ (Low-level Accretion) विकास ही है।

नासा के चंद्रा एक्स-रे का साथ: जब दो महाशक्तियां आपस में मिलीं

वैज्ञानिक किसी भी दावे को तब तक सच नहीं मानते जब तक कि उसके पक्ष में हर तरफ से पक्के सबूत न मिल जाएं। e-MERLIN रेडियो दूरबीन ने रेडियो तरंगों को तो पकड़ लिया था, लेकिन इस बात की क्या गारंटी थी कि वह रेडियो सिग्नल किसी ब्लैक होल का ही है? हो सकता है कि वहाँ बहुत सारे तारे एक साथ टूट रहे हों या कोई अन्य खगोलीय घटना हो रही हो?

इस शंका को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया की सबसे बेहतरीन एक्स-रे वेधशाला—नासा के चंद्रा एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी (NASA’s Chandra X-ray Observatory) के डेटा को इस रिसर्च के साथ जोड़ा।

जब e-MERLIN के रेडियो डेटा और चंद्रा के एक्स-रे डेटा को एक दूसरे के ऊपर रखकर देखा गया, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। एक्स-रे तरंगों के पैटर्न ने यह पूरी तरह साबित कर दिया कि यह ऊर्जा किसी सामान्य तारे, सुपरनोवा के मलबे या एक्स-रे बाइनरी सिस्टम (दो तारों का जोड़ा) से नहीं आ रही है। यह अत्यधिक उच्च तापमान और गुरुत्वाकर्षण का वह पैटर्न था जो केवल और केवल एक सक्रिय रूप से पदार्थ को निगल रहे सुपरमैसिव ब्लैक होल के चारों तरफ ही बन सकता है। इस प्रकार, दो अलग-अलग प्रकार की दूरबीनों के मिलन ने इस खोज पर सत्यता की अंतिम मुहर लगा दी।

आम लोगों के जीवन और समझ के लिए यह खोज क्यों मायने रखती है?

एक आम इंसान के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लाखों प्रकाश वर्ष दूर किसी धुंधले ब्लैक होल के शांत बैठने या जागने से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है?”

इसका जवाब सीधे तौर पर हमारे वजूद और इस ब्रह्मांड की बनावट से जुड़ा हुआ है:

  • आकाशगंगाओं के भाग्य का फैसला: ब्लैक होल को केवल विनाश का प्रतीक माना जाता है, लेकिन असल में वे पूरी आकाशगंगा के ‘इकोसिस्टम’ को नियंत्रित करते हैं। जब ये धुंधले ब्लैक होल हल्के स्तर पर भी सक्रिय होते हैं, तो ये अपने अंदर से भयंकर ऊर्जा के जेट और हवाएं (Outflows) बाहर फेंकते हैं।
  • तारों के जन्म पर नियंत्रण: यह फेंकी गई ऊर्जा आकाशगंगा में मौजूद ठंडी गैस को बहुत ज्यादा गर्म कर देती है। विज्ञान का नियम है कि नए तारों के जन्म के लिए गैस का ठंडा और घना होना जरूरी है। जब ब्लैक होल गैस को गर्म कर देते हैं, तो नए तारों के बनने की प्रक्रिया (Star Formation Rate) धीमी हो जाती है या पूरी तरह रुक जाती है।
  • हमारा अस्तित्व: यदि ये ब्लैक होल इस तरह ऊर्जा का संतुलन न बनाएं, तो आकाशगंगाओं के सारे तारे बहुत जल्दी पैदा होकर खत्म हो जाएंगे और ब्रह्मांड समय से पहले बूढ़ा और बेजान हो जाएगा। हमारी पृथ्वी जिस सूरज के चक्कर काट रही है, उसका अस्तित्व भी कहीं न कहीं इसी तरह के गैलेक्टिक संतुलन का परिणाम है।

यह ऐतिहासिक और आंखें खोल देने वाला अध्ययन खगोल विज्ञान की दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक ‘मंथली नोटिसेस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ (Monthly Notices of the Royal Astronomical Society – MNRAS) में प्रकाशित हुआ है। इस शोध पत्र के मुख्य लेखक डी. आर. ए. विलियम्स-बाल्डविन (D. R. A. Williams-Baldwin) हैं, और इसमें भारत की डॉ. अरु बेरी सहित दुनिया भर के शीर्ष वैज्ञानिकों ने अपना अमूल्य योगदान दिया है।

इस खोज ने यह साबित कर दिया है कि जिसे हम ब्रह्मांड का सूनापन या सन्नाटा समझते हैं, दरअसल वहां बहुत बड़ी हलचल छिपी हुई है। यह तो बस शुरुआत है; आने वाले समय में जब और भी उन्नत दूरबीनें अंतरिक्ष में आंखें खोलेंगी, तो ब्रह्मांड के न जाने ऐसे कितने और छिपे हुए राक्षस हमारे सामने घुटने टेकते नजर आएंगे।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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