असम: असम के सोनितपुर जिले का बोरजुली क्षेत्र, जो अपनी हरियाली और प्राकृतिक संपदा के लिए जाना जाता है, अब एक विशेष पहचान के साथ विश्व मानचित्र पर उभर रहा है। यहाँ की मिट्टी में पनपने वाला ‘जंगली धान’ महज एक पौधा नहीं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा की चाबी है।
हाल ही में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR-NBPGR) के वैज्ञानिकों ने NRAA के सीईओ डॉ. चंद्र शेखर कुमार को इस परियोजना की शानदार प्रगति से अवगत कराया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य हमारे पारंपरिक धान की ऐसी प्रजातियों को बचाना है जो आधुनिक कृषि के शोर में खो रही थीं।
इतिहास और विकास: एक तुलनात्मक विश्लेषण
इतिहास गवाह है कि धान का विकास प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर हुआ है। सदियों से, हमारे पूर्वज जंगली धान की विविधताओं का उपयोग करते आए हैं।
- प्राचीन काल: जंगली धान की ये किस्में बिना किसी आधुनिक खाद या सिंचाई के, प्रकृति की विपरीत परिस्थितियों में भी फलती-फूलती थीं। ये प्राकृतिक रूप से कीट-प्रतिरोधी और प्रतिकूल मौसम के अनुकूल थीं।
- आधुनिक युग (परिवर्तन): ‘हरित क्रांति’ के दौरान, हमने उच्च उपज वाली किस्मों पर ध्यान केंद्रित किया। इस प्रक्रिया में, हमने बहुत से जंगली धान की प्रजातियों को ‘अवांछित’ मानकर उपेक्षित कर दिया।
- वर्तमान रुझान: आज, जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है। अधिक तापमान, बेमौसम बारिश और सूखा हमारी फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। यहाँ, जंगली धान का महत्व फिर से बढ़ गया है। वैज्ञानिक अब समझ रहे हैं कि जो ‘गुण’ उन जंगली पौधों में थे, उन्हीं का उपयोग करके हम आज की धान की किस्मों को ‘सुपर-किस्में’ बना सकते हैं।
संरक्षण क्यों जरूरी है?
डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने स्पष्ट किया कि जंगली धान की प्रजातियाँ एक ‘आनुवंशिक खजाना’ हैं।
- जलवायु-सहिष्णुता: इनमें ऐसी ताकत है कि ये सूखे और बाढ़ का सामना कर सकती हैं।
- पोषक तत्व: जंगली धान में आधुनिक किस्मों की तुलना में बेहतर पोषक तत्व हो सकते हैं।
- खाद्य सुरक्षा: यदि हम इन जीन्स को अपनी खेती में शामिल करते हैं, तो भारत भविष्य के खाद्य संकट से लड़ने के लिए तैयार होगा।
बोरजुली को ‘जैव विविधता धरोहर स्थल’ के रूप में मान्यता मिलना इस बात का प्रमाण है कि यदि हम अपनी प्रकृति के साथ मिलकर काम करें, तो हम अपनी विरासत और भविष्य दोनों को बचा सकते हैं। यह केवल एक राज्य या जिले की सफलता नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत के लिए एक मॉडल है जिसे अन्य फसलों के लिए भी अपनाया जाना चाहिए।
आगे का रास्ता
यह परियोजना दर्शाती है कि कृषि केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, यह संरक्षण के बारे में भी है। वैज्ञानिकों, सरकारी संस्थाओं और स्थानीय समुदायों का यह गठबंधन भारत को एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर कृषि अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रहा है। जंगली धान के संरक्षण के माध्यम से, हम न केवल एक पौधा बचा रहे हैं, बल्कि अपनी मिट्टी की याददाश्त और भविष्य के भोजन की गारंटी भी सुरक्षित कर रहे हैं।



