सरिस्का में 18 साल का सफर: प्रकृति की ओर बाघों की सुखद वापसी

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने अलवर, राजस्थान में 'Tiger Re-introduction: Opportunities & Challenges' पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों के पुनरुद्धार के 18 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक प्रबंधन, पारिस्थितिकी बहाली, सामुदायिक भागीदारी और 'प्रोजेक्ट चीता' की प्रगति पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान तीन प्रमुख प्रकाशन जारी किए गए, जो भारत के भविष्य के वन्यजीव संरक्षण रोडमैप को परिभाषित करते हैं।

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अलवर, राजस्थान: राजस्थान की ऐतिहासिक भूमि अलवर में स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व, जो कभी वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बड़ी त्रासदी का केंद्र था, आज विश्व के लिए एक आशा की किरण बन चुका है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय कार्यशाला ने न केवल अतीत की सफलताओं का जश्न मनाया, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए एक ठोस वैज्ञानिक कार्ययोजना का खाका भी तैयार किया।

सरिस्का का पुनरुद्धार: त्रासदी से गौरव तक का सफर

वर्ष 2005 में सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों की स्थानीय विलुप्ति भारत के लिए एक बहुत बड़ा झटका थी। यह एक ऐसा समय था जब वन्यजीव विशेषज्ञों ने सरिस्का में बाघों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। लेकिन भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति और संरक्षण नीतियों ने इसे इतिहास के पन्नों में सबसे बड़े ‘रिस्टोरेशन’ उदाहरण के रूप में बदल दिया।

वर्ष 2008 में शुरू किया गया सरिस्का टाइगर पुनरुद्धार कार्यक्रम, विश्व का पहला ऐसा वैज्ञानिक प्रयास था जहाँ किसी विलुप्त हो चुकी प्रजाति को उसके मूल प्राकृतिक आवास में सफलतापूर्वक वापस लाया गया। आज 18 वर्षों के पश्चात, सरिस्का में 56 बाघों का होना यह सिद्ध करता है कि यदि सही स्थान पर सही वैज्ञानिक हस्तक्षेप किया जाए, तो प्रकृति स्वयं को पुनः पोषित कर सकती है। श्री यादव ने इसे भारतीय वन सेवा और स्थानीय समुदायों के सम्मिलित प्रयासों का परिणाम बताया।

वैज्ञानिक प्रबंधन: कार्यशाला की मुख्य धुरी

कार्यशाला का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं, बल्कि ‘सक्रिय प्रबंधन’ (Active Management) को कार्यरूप देना था। मंत्री ने बताया कि अब समय आ गया है कि हम ‘सोर्स’ और ‘सिंक’ क्षेत्रों को पहचानें।

  • सोर्स क्षेत्र: जहाँ बाघों की आबादी घनत्व अधिक है, वे क्षेत्र ‘सोर्स’ के रूप में कार्य करेंगे।
  • सिंक क्षेत्र: जिन रिजर्वों में बाघों की संख्या कम है, वहां वैज्ञानिक तरीके से बाघों का स्थानांतरण किया जाएगा।

इस प्रक्रिया में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत पिछले दशक में बाघ रिजर्वों की संख्या 46 से बढ़कर 58 तक पहुंच गई है। भारत ने सेंट पीटर्सबर्ग घोषणापत्र के तहत बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य तय समय से पहले ही हासिल कर लिया है, जो एक वैश्विक कीर्तिमान है।

सामुदायिक सहभागिता: सफलता की कुंजी

मंत्री श्री यादव ने स्पष्ट किया कि संरक्षण का कोई भी मॉडल बिना स्थानीय लोगों के सहयोग के सफल नहीं हो सकता। पन्ना और सरिस्का की सफलता के पीछे स्थानीय जनजातियों और निवासियों का पूर्ण समर्थन था। इसके विपरीत, उन्होंने ओडिशा के सतकोसिया टाइगर रिजर्व का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सामुदायिक सहयोग के अभाव में बाघ पुनरुद्धार की प्रक्रिया कठिन रही।

उन्होंने यह भी जोर दिया कि संरक्षण का अर्थ केवल वन्यजीवों को बचाना नहीं है, बल्कि उस परिदृश्य में रहने वाले लोगों के हितों का संरक्षण करना भी है। स्थानीय समुदायों को पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर उन्हें संरक्षण का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

प्रोजेक्ट चीता: वार्षिक रिपोर्ट का निचोड़

कार्यशाला में ‘प्रोजेक्ट चीता’ की वार्षिक रिपोर्ट (सितंबर 2024–दिसंबर 2025) जारी की गई। यह रिपोर्ट चीता के स्थानांतरण, वेटनरी हस्तक्षेप और प्रबंधन की चुनौतियों का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। इसने भारत में चीतों के अनुकूलन और उनकी जीवनक्षमता के प्रति वैज्ञानिक समुदाय के विश्वास को मजबूत किया है।

जारी किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेज

इस अवसर पर तीन प्रमुख रिपोर्टें जारी की गईं:

  1. Road Map on Active Management of Tigers in India: यह भविष्य की रणनीतियों के लिए एक विस्तृत गाइड है।
  2. Booklet on Reintroduction and Recovery of Tigers in India: इसमें सरिस्का, पन्ना और अन्य रिजर्वों से मिले अनुभवों को संकलित किया गया है।
  3. Annual Report of Project Cheetah: यह परियोजना की निरंतर निगरानी और भविष्य की कार्ययोजनाओं को रेखांकित करती है।

तुलनात्मक विश्लेषण: संरक्षण के बदलते आयाम और वर्तमान ट्रेंड्स

भारतीय वन्यजीव संरक्षण ने पिछले पांच दशकों में एक लंबा रास्ता तय किया है। यदि हम इसे एक तुलनात्मक दृष्टि से देखें:

मापदंड1970 – 2000 (प्रारंभिक युग)2000 – 2026 (आधुनिक युग)
मूल लक्ष्यअवैध शिकार को रोकनापारिस्थितिकी तंत्र की बहाली
प्रबंधन शैलीनिषेधात्मक (Protectionist)सक्रिय (Active Management)
बाघों का प्रबंधनस्वतंत्र इकाइयांलैंडस्केप-आधारित जुड़ाव (Corridors)
सहयोगसरकारी विभाग तक सीमितस्थानीय समुदाय + वैज्ञानिक + सरकार
प्रौद्योगिकीन्यूनतमAI, सैटेलाइट और डेटा मॉडलिंग

वर्तमान में, भारत का वन्यजीव प्रबंधन ‘सस्टेनेबल कंजर्वेशन’ की ओर अग्रसर है। अब हम केवल बाघों की आबादी नहीं गिन रहे हैं, बल्कि ‘प्रे-बेस’ (Prey Base – शिकार का आधार) बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। गौड़ और बारासिंघा जैसे जानवरों का स्थानांतरण इस बात का संकेत है कि हम पूरे खाद्य चक्र को पुनर्स्थापित कर रहे हैं।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के दौर में, वन, जल, और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाने के लिए ‘लैंडस्केप कनेक्टिविटी’ पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बाघों और हाथियों के साझा गलियारों को सुरक्षित करना अब भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती और प्राथमिकता है।

निष्कर्ष: विज्ञान और मानवीय मूल्यों का संगम

अंत में, श्री भूपेंद्र यादव ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही—”हम प्रकृति के संरक्षक हैं।” हमारा संरक्षण कार्य केवल डेटा के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें मानवीय संवेदनाएं भी शामिल होनी चाहिए। भारत का यह मॉडल दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश करता है कि कैसे एक आधुनिक राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ प्राकृतिक धरोहर को भी सहेज सकता है।

सरिस्का में आयोजित यह कार्यशाला इस बात का प्रमाण है कि भारत अब किसी भी वन्यजीव चुनौती का सामना करने और समाधान खोजने के लिए पूरी तरह सक्षम है। चाहे वह बाघ हो या चीता, भारत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण हर प्रजाति को विलुप्ति के कगार से वापस लाने के लिए कृतसंकल्प है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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