संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने का ‘वैज्ञानिक’ संकल्प

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 38 के तहत संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान और अधिसूचना के लिए एक व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। यह SOP राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वैज्ञानिक साक्ष्यों, पारदर्शी मूल्यांकन और स्थानीय भागीदारी के माध्यम से विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक समान कार्यप्रणाली प्रदान करती है।

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नई दिल्ली: भारत, जो वैश्विक जैव विविधता के नक्शे पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, आज पारिस्थितिक अनिश्चितता के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ प्रकृति का संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद अद्वितीय वनस्पतियां और जीव-जंतु, जो सदियों से हमारी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहचान रहे हैं, आज पर्यावास के क्षरण, प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियों के प्रसार और जलवायु परिवर्तन के गहरे प्रभावों से जूझ रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) का ‘धारा 38’ के तहत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करना, संरक्षण की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। यह प्रयास न केवल मौजूदा संकटों को संबोधित करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जैव विविधता के संरक्षण की एक सुदृढ़ रूपरेखा भी तैयार करता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विकासवादी यात्रा

भारत में जैव विविधता के संरक्षण का कानूनी इतिहास एक लंबी यात्रा रहा है। यदि हम पीछे मुड़कर देखें, तो स्वतंत्रता के बाद से ही भारत ने प्रकृति संरक्षण के लिए विविध प्रयास किए हैं। 1972 का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम केवल ‘वन्यजीवों’ की सुरक्षा तक सीमित था। हालांकि, समय की मांग थी कि संरक्षण के दायरे को व्यापक बनाया जाए। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2002 में ‘जैव विविधता अधिनियम’ (Biological Diversity Act, 2002) को लागू किया गया, जो किसी भी देश द्वारा जैव संसाधनों के सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत वितरण के लिए बनाया गया सबसे प्रगतिशील कानून था।

इस अधिनियम की धारा 38, जिसे आज ‘संकटग्रस्त प्रजातियों’ की सुरक्षा का प्रमुख आधार माना जा रहा है, केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के परामर्श से किसी भी ऐसी प्रजाति को संकटग्रस्त घोषित करने का संवैधानिक अधिकार देती है, जो विलुप्ति के कगार पर है या जिसके आने वाले समय में विलुप्त होने का प्रबल खतरा है। अब तक, मंत्रालय द्वारा 159 पौधों और 173 पशु प्रजातियों को इस सुरक्षा कवच के तहत लाया गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत निरंतर अपनी पारिस्थितिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहा है।

नई एसओपी: वैज्ञानिक आधार और पारदर्शी प्रक्रिया

भारत जैसे विशाल भौगोलिक विविधता वाले देश में, जहाँ हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैले विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र हैं, प्रजातियों की पहचान के लिए एक समान मानक की बहुत आवश्यकता थी। नई एसओपी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह स्पष्ट दिशा-निर्देश देती है कि संकटग्रस्त प्रजातियों का चयन व्यक्तिगत अनुमानों के आधार पर नहीं, बल्कि कठोर वैज्ञानिक डेटा पर आधारित होना चाहिए।

प्रक्रिया के मुख्य स्तंभ:

  1. वैज्ञानिक मूल्यांकन: डेटा संग्रह में अब भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों का सीधा हस्तक्षेप होगा।
  2. हितधारकों का समन्वय: इसमें स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMC) को जोड़ा गया है, क्योंकि वे ज़मीनी स्तर पर बदलाव को बेहतर समझती हैं।
  3. सत्यापन एवं अधिसूचना: पारदर्शिता को प्राथमिकता देते हुए, प्रत्येक स्तर पर साक्ष्यों का सत्यापन आवश्यक किया गया है, ताकि केवल वास्तविक रूप से खतरे में पड़ी प्रजातियों को ही संरक्षित सूची में जगह मिले।

धाराओं का क्रियान्वयन और संरक्षण का प्रभाव

धारा 38 के तहत जब कोई प्रजाति अधिसूचित की जाती है, तो वह केवल कागजी दस्तावेजों का हिस्सा नहीं रह जाती। इसका तात्पर्य है कि उस प्रजाति के संग्रह, प्रसंस्करण और व्यापार पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लग जाता है। इसके बाद, उस प्रजाति के संरक्षण और उसके पुनर्वास (Recovery) के लिए एक समयबद्ध कार्य योजना बनाई जाती है। यह दृष्टिकोण उस प्रजाति के उस आवास (Habitat) को भी सुरक्षित करता है जिस पर वह निर्भर है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से पूरी खाद्य शृंखला को लाभ मिलता है।

तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक बनाम आधुनिक संरक्षण दृष्टिकोण

वर्तमान प्रवृत्तियों का यदि हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से तुलना करें, तो संरक्षण की रणनीति में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है:

आधारपुराना दृष्टिकोण (पारंपरिक)नया दृष्टिकोण (आधुनिक एसओपी आधारित)
दृष्टिकोणप्रजाति-विशिष्ट (Project based)पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem-based)
प्रक्रियाकेंद्रीकृत और अनौपचारिकविकेंद्रीकृत, वैज्ञानिक और मानकबद्ध
भागीदारीसरकारी विभागों तक सीमितसामुदायिक और शैक्षणिक संस्थानों की सक्रिय भागीदारी
लक्ष्यकेवल रक्षा (Protection)संरक्षण, पुनर्प्राप्ति और निगरानी

यह बदलाव दर्शाता है कि कैसे भारत ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ जैसे सफल मिशनों से आगे बढ़कर अब समग्र जैव विविधता के संरक्षण की ओर बढ़ रहा है। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KM-GBF) और राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य योजना 2024-2030 के लक्ष्य-4 के साथ तालमेल बिठाते हुए, भारत ने खुद को वैश्विक संरक्षण लक्ष्यों के केंद्र में स्थापित कर लिया है।

निष्कर्ष और भावी राह

नई एसओपी न केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रकटीकरण है। इसमें वैज्ञानिक मूल्यांकन, हितधारकों की भागीदारी और निरंतर निगरानी पर जोर देने से यह सुनिश्चित होता है कि आने वाले समय में विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही प्रजातियों को समय पर बचाया जा सकेगा। यह प्रयास जैविक विविधता (लाभों का निष्पक्ष बंटवारा) विनियम, 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन को भी मजबूती प्रदान करेगा। अंततः, प्रजातियों का संरक्षण ही मानव सभ्यता की निरंतरता की गारंटी है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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