डॉ. संतोष पटेल
जर्मन दार्शनिक और विचारक जॉन गॉटफ्रेड हर्डर को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमुख प्रतिपादकों में गिना जाता है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘वोक्सगाइस्ट’अर्थात् ‘लोक-आत्मा’ या ‘जनभावना’ की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका मानना था कि प्रत्येक राष्ट्र की एक विशिष्ट पहचान होती है, जो उसकी भाषा, संस्कृति और इतिहास से निर्मित होती है। इस दृष्टि से राष्ट्रवाद एक सकारात्मक और प्रेरक भावना है, किंतु जब यह विवेकहीन आग्रह या अंध-भक्ति का रूप ले लेता है, तब वह राष्ट्र के विकास में बाधक भी बन सकता है।
‘शॉविनिज़्म’ शब्द फ्रांस के निकोलस शॉविन नामक सैनिक से जुड़ा माना जाता है, जिसे नेपोलियन के प्रति अत्यधिक निष्ठा और अंध-समर्थन का प्रतीक माना गया। इसी संदर्भ में आधुनिक राजनीतिक विमर्श में अति-राष्ट्रवाद या अंध-राष्ट्रवाद की चर्चा होती है।
भारतीय समाज में राष्ट्रवाद को लेकर एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर भ्रष्टाचार, मिलावट, सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग और प्रशासनिक अनियमितताओं को अक्सर सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर असहमति व्यक्त करने वालों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। यह स्थिति राष्ट्रवाद की हमारी समझ पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
हमारे यहां ‘राष्ट्र-विरोध’ की परिभाषा प्रायः चयनात्मक प्रतीत होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी नीति की आलोचना करता है, किसी संवेदनशील विषय पर अलग राय रखता है या सरकार से सवाल पूछता है, तो उसे कभी-कभी राष्ट्र-विरोधी करार देने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर, सार्वजनिक धन का दुरुपयोग करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त लोग, खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वाले, कर चोरी करने वाले या बैंकिंग व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्तियों को अक्सर उसी कठोर दृष्टि से नहीं देखा जाता। जबकि ऐसे कृत्य भी राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और नैतिक ढांचे को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं।
वास्तविकता यह है कि राष्ट्र को कमजोर करने वाले खतरे केवल सीमाओं के बाहर से नहीं आते। कई बार वे भीतर से भी पैदा होते हैं। भ्रष्टाचार, कुप्रशासन, संसाधनों की लूट और सार्वजनिक संस्थाओं का क्षरण किसी भी राष्ट्र की प्रगति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए राष्ट्रहित की चर्चा में इन मुद्दों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में देशभक्ति का अर्थ सरकार के प्रत्येक निर्णय का समर्थन करना नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका में व्यापक जन-विरोध और बौद्धिक बहस हुई। इन बहसों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक जवाबदेह बनाने का कार्य किया। इसी प्रकार कई देशों में रक्षा सौदों, विदेश नीति और सैन्य हस्तक्षेपों पर खुलकर चर्चा होती रही है। असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति माना जाता है।
इसके विपरीत, भारत में कई बार असहमति को राष्ट्रभक्ति के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाता है। 1987 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना की तैनाती से जुड़े निर्णयों और उनके परिणामों पर समय-समय पर अनेक विश्लेषण सामने आए हैं। बाद के वर्षों में इस अभियान की रणनीति और प्रभावों पर गंभीर बहस हुई। यह उदाहरण दर्शाता है कि लोकतांत्रिक समाजों में नीतिगत निर्णयों की समीक्षा और आलोचना आवश्यक होती है, ताकि भविष्य में बेहतर निर्णय लिए जा सकें।
आज भी समाज में यह धारणा मौजूद है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म, जाति, विदेश नीति या शासन से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर प्रचलित दृष्टिकोण से अलग राय रखता है, तो उसे सामाजिक या पेशेवर प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ सकता है। अनेक लेखक, पत्रकार, कलाकार और बुद्धिजीवी समय-समय पर ऐसी चुनौतियों का उल्लेख करते रहे हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हो सकती है, क्योंकि स्वस्थ लोकतंत्र विचारों की विविधता और खुली बहस पर ही आधारित होता है।
इतिहास बताता है कि वे राष्ट्र अधिक मजबूत और विकसित बने हैं, जहां प्रश्न पूछने, बहस करने और सत्ता से जवाब मांगने की संस्कृति जीवित रही है। इसलिए राष्ट्रवाद की अवधारणा को केवल भावनात्मक समर्थन तक सीमित करने के बजाय उसे उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और नागरिक चेतना से जोड़ने की आवश्यकता है।
जो लोग व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं, वे अनिवार्य रूप से राष्ट्र-विरोधी नहीं होते। अनेक बार वही लोग सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बौद्धिक ईमानदारी और रचनात्मक आलोचना किसी राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक शक्ति होती है। राष्ट्र की रक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिक ही नहीं करते, बल्कि वे नागरिक भी करते हैं जो सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय की मांग करते हैं।
यदि भारत को एक सशक्त, समावेशी और आत्मविश्वासी राष्ट्र बनना है, तो ‘अंध-समर्थन’ के स्थान पर ‘तार्किक समर्थन और रचनात्मक आलोचना’ को महत्व देना होगा। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही सच्चे राष्ट्रहित का आधार भी।
(लेखक के निजी विचार हैं।)



