भाषिणी और GeM का महा-समझौता: सरकारी खरीद में भाषा की बाधा होगी खत्म।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में डिजिटल समावेशन (Digital Inclusion) का एक नया अध्याय! भाषा की दीवार को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए 'सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM)' और 'डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन (DIBD)' ने मिलाया हाथ।

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नई दिल्ली: भारत सरकार का एक ऐसा विजन, जो देश के अंतिम छोर पर बैठे उद्यमी को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने जा रहा है। डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन (DIBD) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने मिलकर भारत की सार्वजनिक खरीद प्रणाली (Public Procurement System) का चेहरा बदलने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह क्रांतिकारी कदम ‘भाषिणी फॉर सेवा/संचालन – ए भाषिणी सहयोगी कार्यक्रम’ के तहत उठाया गया है, जिसका सीधा संदेश है: “भाषा अब किसी भी व्यवसाय की तरक्की में रुकावट नहीं बनेगी।”

दो दिग्गजों का महा-मिलन: क्या है पूरा मामला?

इस साझेदारी के तहत दो बेहद शक्तिशाली सरकारी विंग्स एक साथ आए हैं:

  1. इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत आने वाला डिजिटल इंडिया कॉरपोरेशन की इकाई डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन (DIBD), जो भारत में एआई-आधारित भाषा समाधानों का नेतृत्व कर रही है।
  2. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला राष्ट्रीय सार्वजनिक खरीद पोर्टल (GeM), जहाँ से देश की सभी सरकारी संस्थाएं, मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) अरबों रुपये की खरीदारी करते हैं।

इस अनूठे सहयोग का उद्देश्य GeM प्लेटफॉर्म पर बहुभाषी पहुंच (Multilingual Access), बहुभाषी प्रशासन और बहुभाषी सेवा वितरण को इतना मजबूत करना है कि कोई भी उपयोगकर्ता अपनी पसंदीदा और मातृभाषा में जानकारी और सेवाओं का लाभ उठा सके।

 वॉयस-फर्स्ट और जनरेटिव एआई (Generative AI) का जादू

इस पहल की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसकी तकनीक है। भारत विविधताओं का देश है जहाँ कुछ किलोमीटर पर भाषाएं बदल जाती हैं। इस समस्या को हल करने के लिए 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए:

  • वॉयस-फर्स्ट तकनीक (Voice-First Technology): यानी अब पोर्टल पर काम करने के लिए टाइप करना जरूरी नहीं होगा, सिर्फ बोलकर भी काम किया जा सकेगा।
  • जनरेटिव एआई (Generative AI): जो यूजर के सवालों को समझकर उसकी ही स्थानीय भाषा में सटीक जवाब देगा।

 भाषिणी के ये 5 ‘हथियार’ बदलेंगे तस्वीर:

एमओयू के तहत दोनों टीमें मिलकर भाषिणी के पांच प्रमुख डिजिटल संसाधनों का एकीकरण (Integration) करेंगी:

  • भाषिणी उद्यात (Udyat): अनुवाद को सटीक बनाने के लिए।
  • भाषिणी मित्र (Mitra): यूजर्स की सहायता के लिए एआई चैटबॉट।
  • भाषिणी ऐपमित्र (AppMitra): मोबाइल ऐप्स के लिए कस्टमाइज्ड समाधान।
  • भाषिणी सहयोगी (Sahayogi): संवाद को सरल बनाने के लिए।
  • भाषिणी प्रवक्ता (Pravakta): सटीक वॉयस ओवर और टेक्स्ट-टू-स्पीच सेवाओं के लिए।

इसके अलावा इसमें ट्रांसलेशन एपीआई, क्षेत्र-विशिष्ट (Domain-Specific) भाषा मॉडल, बहुभाषी शब्दावली, वॉयस बॉट और भाषाई डेटा सेट तैयार करने जैसे बड़े काम शामिल होंगे।

 एमएसएमई (MSMEs), स्टार्टअप्स और छोटे व्यवसायों के लिए ‘गेम-चेंजर’

“सरकार का मानना है कि भाषा किसी भी व्यवसाय या उद्यमी के लिए सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में भागीदारी की बाधा नहीं बननी चाहिए।”

अब तक अंग्रेजी या शुद्ध हिंदी की समझ न होने के कारण कई छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के होनहार कारीगर, महिला उद्यमी, स्टार्टअप्स और एमएसएमई (MSMEs) सरकारी टेंडर्स या GeM पर पंजीकरण करने से कतराते थे। लेकिन इस समझौते के बाद:

  • पंजीकरण (Registration) स्थानीय भाषा में चुटकियों में होगा।
  • प्लेटफॉर्म नेविगेशन (Navigation) और कम्युनिकेशन बेहद आसान हो जाएगा।
  • सुदूर असम का चाय व्यापारी, गुजरात का कपड़ा बुनकर या तमिलनाडु का हस्तशिल्प कलाकार सीधे केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी भाषा में डील कर सकेगा।

 आंकड़े जो गवाही देते हैं: भाषिणी की ताकत

भाषिणी कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि यह पहले से ही भारतीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ बन चुका है:

  • 800+ से अधिक सरकारी वेबसाइटों को यह वर्तमान में सपोर्ट कर रहा है।
  • 1.5 करोड़ से अधिक एआई-आधारित रिक्वेस्ट रोजाना इस पर प्रोसेस की जाती हैं।
  • 36 भारतीय पाठ्य (Text) भाषाओं, 23 भारतीय वॉयस भाषाओं और 35 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का मजबूत सपोर्ट इसके पास है।

इसके साथ ही, ‘भाषादान’ कार्यक्रम के माध्यम से आम नागरिकों को भी इस अभियान से जोड़ा जा रहा है ताकि क्षेत्रीय भाषाई डेटा का एक विशाल और सटीक संग्रह तैयार किया जा सके।

 नेतृत्व की आवाज: भारत के भविष्य पर विचार

  • अजित बी. चव्हाण (एसीईओ एवं मुख्य विक्रेता अधिकारी, GeM):

यह सहयोग भाषिणी की एआई आधारित भाषा तकनीकों का उपयोग कर सार्वजनिक खरीद में भाषाई बाधाओं को दूर करेगा और GeM को देशभर के खरीदारों और विक्रेताओं के लिए अधिक सुलभ बनाएगा।”

  • अमिताभ नाग (सीईओ, डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन):

भाषिणी का उद्देश्य डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) को वास्तव में समावेशी बनाना है। GeM के साथ हमारा सहयोग सार्वजनिक खरीद तक पहुंच को लोकतांत्रिक (Democratize) बनाएगा। यह पहल स्थानीय व्यवसायों और स्वदेशी उद्यमों को राष्ट्रीय अवसरों से जोड़ेगी और डिजिटल रूप से समावेशी अर्थव्यवस्था के भारत के विजन को मजबूत करेगी।”

निष्कर्ष: आत्मनिर्भर भारत का ‘असली’ डिजिटल अवतार

जब तकनीक स्थानीय संस्कृति और भाषा से मिलती है, तो विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाती है। GeM और भाषिणी का यह संगम सिर्फ दो विभागों का समझौता नहीं है, बल्कि यह डिजिटल रूप से सशक्त और समावेशी भारत की नींव है। अब भारत का हर कोना व्यापार करेगा, अपनी भाषा में करेगा और गर्व से देश की जीडीपी में अपना योगदान देगा। 

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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