नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और घरेलू आर्थिक कमजोरी के बीच भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर 95.12 प्रति डॉलर पर पहुंच गया है। ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध तो महज एक बाहरी कारण है, असली समस्या देश के भीतर की आर्थिक बुनियादी संरचना में छिपी है।
आरबीआई के कदमों पर उठते सवाल
बाजार विशेषज्ञों और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा बैंकों की डॉलर पोजिशन को 100 मिलियन तक सीमित करने के फैसले ने निवेशकों के बीच घबराहट पैदा कर दी है। बाजार ने इसे RBI की लाचारी के रूप में देखा, जिससे सट्टेबाजों को रुपये के खिलाफ दांव लगाने का और मौका मिल गया।
गवर्नर संजय मल्होत्रा के नेतृत्व में ब्याज दरों में कटौती कर निवेश बढ़ाने और निर्यात को सहारा देने के लिए रुपये को थोड़ा ढीला छोड़ने की रणनीति अपनाई गई थी, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने इस गणित को बिगाड़ दिया है। अब RBI के पास विकास दर बनाए रखने या रुपये को थामने में से किसी एक को चुनने की कठिन चुनौती है।
आम आदमी की जेब पर सीधा प्रहार
रुपये की इस गिरावट का सबसे ज्यादा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ेगा। चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ेंगी। इसका सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ेगा, जिससे सब्जी, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगेंगे। इसके अलावा, विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों के लिए फीस और रहने का खर्च अचानक बढ़ गया है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट पूरी तरह गड़बड़ा सकता है।
निवेश और सरकारी खजाने पर दबाव
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अकेले मार्च के महीने में भारतीय बाजार से करीब 12 अरब डॉलर की निकासी की है। रुपये की कमजोरी निवेशकों के मुनाफे को कम कर देती है, जिससे वे भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालने लगते हैं। दूसरी ओर, सरकार को खाद और ईंधन पर सब्सिडी का बोझ उठाने के लिए अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है। इससे वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा है, जो अंततः देश की क्रेडिट रेटिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि रुपया 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर बढ़ता है, तो इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। टेक्सटाइल और डायमंड जैसे निर्यात-आधारित क्षेत्रों में छंटनी का डर बढ़ गया है। हालांकि RBI ने स्थिति को संभालने के लिए कुछ हस्तक्षेप किए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मुद्रा की गिरावट रोकना काफी नहीं होगा; सरकार को बढ़ती महंगाई और घटती क्रय शक्ति से गरीब तबके को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।



