नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ देशव्यापी असंतोष अब एक बड़े ‘जन-विद्रोह’ का रूप ले चुका है। शनिवार को अमेरिका के सभी 50 राज्यों में आयोजित ‘नो किंग्स रैली’ में रिकॉर्ड 80 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। 3,300 से अधिक स्थानों पर हुए इन प्रदर्शनों ने ट्रंप प्रशासन की नींव हिला दी है। प्रदर्शनकारी ईरान के साथ बढ़ते युद्ध के खतरे, सख्त इमिग्रेशन नीतियों और बेकाबू महंगाई को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
तीसरा और सबसे बड़ा प्रदर्शन
‘नो किंग्स’ आंदोलन के तहत यह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। इससे पहले जून 2025 और अक्टूबर 2025 में भी राष्ट्रीय स्तर पर रैलियां हुई थीं, लेकिन शनिवार (28 मार्च) के प्रदर्शन में पिछली बार की तुलना में 10 लाख अधिक लोग शामिल हुए। प्रदर्शनों के केंद्रों की संख्या में भी 600 का इजाफा देखा गया, जो इस आंदोलन की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
विरोध के तीन मुख्य केंद्र
ईरान के साथ तनाव: युद्ध की आहट से आम अमेरिकी नागरिक डरा हुआ है।
महंगाई की मार: आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है।
इमिग्रेशन पर सख्ती: प्रशासन द्वारा की जा रही सख्त कार्रवाई को ‘अलोकतांत्रिक’ बताया जा रहा है।
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया
इतने बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस ने गंभीरता से लेने के बजाय ‘हल्का’ बताने की कोशिश की है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में इन रैलियों को ‘थेरेपी सेशन’ करार दिया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग केवल अपनी भड़ास निकाल रहे हैं और इससे सरकारी नीतियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद का बचाव करते हुए कहा, “मैं कोई ‘राजा’ नहीं हूँ। मेरे सभी फैसले देश को मजबूत बनाने के लिए हैं। मेरे खिलाफ लगाए जा रहे आरोप राजनीति से प्रेरित और पूरी तरह गलत हैं।”
दुनिया भर में चर्चा
ट्रंप विरोधी लहर अब केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रही है। शनिवार को पेरिस, लंदन और लिस्बन जैसे प्रमुख यूरोपीय शहरों में भी हजारों लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप की नीतियां वैश्विक शांति के लिए खतरा बन रही हैं।



