नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया ने राज्य की राजनीति को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। दिसंबर 2025 में जारी मसौदा सूची से 58 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जो अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट श्रेणी में थे। सुनवाई के दूसरे चरण में करीब पांच लाख लोग नहीं पहुंचे, इसलिए कुल हटाए जाने वाले नामों का आंकड़ा 63 लाख के आसपास पहुंचने का अनुमान है। यह संख्या चौंकाने वाली है, लेकिन चुनाव आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी और अवसरपूर्ण रही है। दावे-आपत्तियों पर सुनवाई की समयसीमा बढ़ाई गई, सुप्रीम कोर्ट निगरानी रख रहा है और आयोग ने बार-बार स्पष्ट किया है कि कोई भी पात्र मतदाता बिना अवसर दिए नहीं हटाया जाएगा। ममता बनर्जी ने इसे ‘जानबूझकर नाम काटने की साजिश’ बताकर पहले सड़क पर धरना-प्रदर्शन किया, फिर वकील की हैसियत से सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। उनका आरोप है कि लाखों वैध मतदाताओं, खासकर महिलाओं और प्रवासी मजदूरों के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि एसआईआर की प्रक्रिया पूरे देश में चल रही है। बिहार, राजस्थान, गुजरात समेत कई राज्यों में भी लाखों नाम हटे हैं। ये नाम मुख्यतः वे हैं जो मर चुके हैं, दूसरे राज्य चले गए हैं या वर्षों से पते पर नहीं मिल रहे। बंगाल में भी यही स्थिति है। अगर कोई जानबूझकर हटाने की बात कह रहा है, तो सवाल यह है कि क्यों अन्य राज्यों में ऐसा आरोप नहीं लगता? वास्तविक समस्या यह है कि बंगाल में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों में घुसपैठ कर चुके हैं। एसआईआर से इन्हीं के नाम कटने का खतरा है, इसलिए विरोध इतना तीव्र है। ममता सरकार चाहती है कि प्रक्रिया हो ही न, या इतनी लचीली हो कि कोई भी नाम न कटे। लेकिन यह लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है। निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद स्वच्छ मतदाता सूची है। अगर मृतकों, डुप्लिकेट और विदेशियों को वोट देने का अधिकार मिलता रहेगा, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। चुनाव आयोग ने समय-समय पर एसआईआर करनी ही चाहिए। बिहार में इसी प्रक्रिया से लाखों फर्जी नाम हटे थे। बंगाल में भी यही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में प्रक्रिया चल रही है, समयसीमा बढ़ाई जा रही है, दस्तावेज जमा करने का मौका दिया जा रहा है। फिर विरोध का क्या औचित्य? ममता बनर्जी का उद्देश्य स्पष्ट है। चुनाव आयोग को बदनाम करना और अपने वोट बैंक को बचाना। लेकिन इससे लोकतंत्र की छवि खराब हो रही है। भारत सरकार को अब गंभीर कदम उठाने चाहिए। अगर एसआईआर से बांग्लादेशी घुसपैठिए चिह्नित हो रहे हैं, तो उन्हें निष्कासित करने का प्रभावी अभियान चलाना चाहिए। बार-बार भाषण देने से काम नहीं चलेगा। साथ ही, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को देशव्यापी स्तर पर लागू करने में देरी क्यों? मतदाता सूचियों का संशोधन और एनआरसी साथ-साथ चलना चाहिए। तभी घुसपैठ रुकेगी और असली भारतीयों का अधिकार सुरक्षित रहेगा। अंत में, एसआईआर का विरोध लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि फर्जी वोटों की रक्षा है। चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में यह सुनिश्चित हो कि कोई वैध मतदाता न छूटे, लेकिन कोई फर्जी भी न बचे। स्वच्छ मतदाता सूची ही निष्पक्ष चुनाव की गारंटी है। बंगाल के लोगों को यह समझना होगा कि नाम कटना अन्याय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सफाई है।



