नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने किशोरियों के स्वास्थ्य और गरिमा को सुरक्षित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और स्वास्थ्य तक पहुंच कोई सुविधा नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है।
1. मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएं।
- उद्देश्य: मासिक धर्म के कारण लड़कियों की पढ़ाई न छूटे और वे स्कूल से अनुपस्थित न रहें।
- अनुपालन: केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे भारत में कड़ाई से लागू करने का आदेश दिया गया है।
2. अलग और ‘दिव्यांग-अनुकूल’ शौचालय
अदालत ने केवल पैड वितरण तक ही सीमित न रहकर स्कूलों के बुनियादी ढांचे पर भी सख्त रुख अपनाया है:
- लिंग-आधारित अलगाव: सभी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय होना अनिवार्य है।
- दिव्यांग अनुकूल: शौचालय दिव्यांग-अनुकूल (Disabled-friendly) होने चाहिए।
- सफाई: शौचालयों में स्वच्छता और पानी की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
3. मान्यता रद्द करने की चेतावनी
कोर्ट ने निजी स्कूलों को चेतावनी दी है कि यदि वे इन निर्देशों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता (De-recognition) रद्द की जा सकती है। साथ ही, राज्य सरकारों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा यदि वे मुफ्त सैनिटरी पैड और पर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं सुनिश्चित करने में विफल रहती हैं।
4. “शर्म नहीं, सम्मान का विषय”
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने फैसले के अंत में एक भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह निर्णय केवल कानूनी हितधारकों के लिए नहीं, बल्कि उन कक्षाओं के लिए है जहाँ लड़कियाँ मदद मांगने में झिझकती हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि मासिक धर्म कभी भी शर्म, बहिष्कार या बाधित शिक्षा का कारण नहीं बनना चाहिए।



