गीत मरते नहीं: जीवन संघर्षों और संवेदनाओं का मधुर संगम

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हिन्दी साहित्य के विशाल प्रांगण में गीत वह विधा है, जो सीधे हृदय की गहराइयों से निकलकर लोक-कंठ का हार बनती है। डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह “गीत मरते नहीं” इसी समृद्ध परम्परा की अगली कड़ी है।

हिन्दी गीत परम्परा आदि काल से ही रस-धार के रूप में प्रवाहित रही है। जहाँ कबीर के दर्शन में संगीत की मधुरता है, वहीं सूर और मीरा का सम्पूर्ण काव्य ही गेयता पर आधारित है। निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा और हरिवंश राय बच्चन जैसे दिग्गजों ने जिस गीत-वृक्ष को सींचा, उसे गोपाल सिंह नेपाली और नीरज जैसे गीतकारों ने जन-जन तक पहुँचाया।

डॉ. ‘मस्ताना’ इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए अपनी माटी की खुशबू को जीवंत कर रहे हैं।

लेखक का मानना है कि मानव जीवन जैसे-जैसे बौद्धिक और शुष्क होता जाएगा, उसे गीतों की आवश्यकता और अधिक महसूस होगी। वे गीत की अमरता पर विश्वास करते हुए कहते हैं कि गीत ‘फिनिक्स’ पक्षी की तरह चुनौतियों की आग से नया रूप लेकर प्रकट होते हैं।

कवि का परिचय और पृष्ठभूमि

डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ का व्यक्तित्व बहुआयामी है। भूगोल में प्रतिष्ठा और हिन्दी में एम.ए., डॉक्ट्रेट के साथ संगीत की शिक्षा ने उनके काव्य को एक शास्त्रीय गरिमा और लोक-लय प्रदान की है। एक छात्र के रूप में लोक गायक के तौर पर मंचों से शुरू हुई उनकी यात्रा आज एक प्रतिष्ठित गीतकार के रूप में हमारे सामने है। इससे पूर्व उनकी कृति ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ भोजपुरी साहित्य में काफी यश अर्जित कर चुकी है और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों का हिस्सा भी रही है।
विविध भावों का ताना-बना

इस संग्रह में कुल 75 हिन्दी गीत संकलित हैं, जो जीवन के विभिन्न रंगों—प्रकृति, प्रेम, सामाजिक सरोकार और राष्ट्रीयता को समेटे हुए हैं।

सामाजिक सरोकार और संघर्ष: संग्रह का आरम्भ ‘राग दरबारी’ से होता है, जो आधुनिक जीवन की लाचारी को दर्शाता है:
“आँसू की खेती होती है, मेरी चारदीवारी में / जीवन को जीना पड़ता है, जीने की लाचारी में”

राष्ट्रीय बोध: कवि के हृदय में राष्ट्र के प्रति गहरा अनुराग है। ‘हिन्दुस्तानी’, ‘पहचान’ और ‘मेरा देश’ जैसे गीत देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हैं। वे लिखते हैं:

“कुछ भी लिखने से पहले, अपने को हिन्दुस्तानी लिख”

प्रकृति और सौन्दर्य: प्रकृति उनके गीतों में सजीव हो उठती है। ‘चाँद सावन का’, ‘प्रिया शर्वरी’ और ‘अलसायी सुबह’ जैसे गीतों में बिम्बों और अलंकारों का सहज प्रयोग मिलता है। ‘चाँद’ शीर्षक गीत में वे लिखते हैं कि झील में उतरा चाँद पानी में आग लगा देता है।

स्त्री विमर्श: संग्रह का समापन एक मर्मस्पर्शी गीत ‘मेरा दोष बताना मां’ से होता है, जो कन्या भ्रूण हत्या जैसे संवेदनशील विषय पर करारा प्रहार करता है। यह गीत बेटी की माँ से गुहार है:

“बेटी हूँ पर कष्ट नहीं देने वाली / मैं तो हूँ माँ तेरा दुख हरने वाली”।

शिल्प और भाषा

डॉ. ‘मस्ताना’ के गीतों में छंदों की लय और संगीत का अनवरत प्रवाह है। उनकी भाषा सरल, सुबोध और प्रभावोत्पादक है। वे व्यर्थ की चाटुकारिता के स्थान पर यथार्थ लिखने के पक्षधर हैं। वे स्पष्ट कहते हैं:

“क्या चाटुकारिता पर लिखना? रोटी की कथा लिखो भाई / काले धन पर मारो कुठार, निर्धन की व्यथा लिखो भाई”।

कवि ने आत्म-लोचन और आत्मानुसंधान को अपने गीतों का संबल बनाया है। वे उधार के ऐश्वर्य के बजाय आत्म-संतोष के जीवन को प्राथमिकता देते हैं।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, “गीत मरते नहीं” हिन्दी गीत-जगत में एक नई किरण की तरह है। डॉ. परमेश्वर भक्त के शब्दों में, यह संग्रह अपनी ‘काया’ (शरीर) और ‘छाया’ (आत्मा) दोनों ही दृष्टि से साहित्य में अपना मुकम्मल स्थान बनाने में सक्षम है। डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ ने अभाव और संघर्षों की जमीन से जो शब्द चुने हैं, वे पाठकों के हृदय को रस-प्लावित करने की क्षमता रखते हैं। यह कृति न केवल गीत-प्रेमियों के लिए बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो शब्दों में जीवन की धड़कन ढूँढता है।

पुस्तक का नाम: गीत मरते नहीं (हिन्दी गीत संग्रह)
लेखक: डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’

समीक्षक: डॉ.संतोष पटेल

DISHA ROJHE

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