अनुभूतियों के बंद गलियारों से मुक्ति की तलाश

निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा का काव्य संग्रह 'कोई राह बाहर निकलती है' समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में एक ऐसी दस्तक है, जो शोर नहीं मचाती, बल्कि पाठक की संवेदनाओं की उंगली पकडकर उसे जीवन के उन कोनों में ले जाती है जहां स्मृतियां, संघर्ष और जिजीविषा एक साथ वास करते हैं

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निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा का काव्य संग्रह ‘कोई राह बाहर निकलती है’ समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में एक ऐसी दस्तक है, जो शोर नहीं मचाती, बल्कि पाठक की संवेदनाओं की उंगली पकडकर उसे जीवन के उन कोनों में ले जाती है जहां स्मृतियां, संघर्ष और जिजीविषा एक साथ वास करते हैं।

लगभग आधी सदी के इंतजार और जीवन के विविध अनुभवों को सहेजकर आई ये कविताएं केवल शब्द नहीं, बल्कि कवि के अंतर्मन का वह दस्तावेज हैं जो ‘रजनीगंधा की महक’ (प्रथम संग्रह) से शुरू होकर आज एक परिपक्व अभिव्यक्ति के रूप में हमारे सामने हैं।

प्रसिद्ध आलोचक टी. एस. एलियट ने कहा था: “कविता भावनाओं का उच्छृंखल प्रदर्शन नहीं, बल्कि भावनाओं से पलायन है।”

निखिलेश्वर जी की कविताएं इसी ‘पलायन’ और ‘प्रवेश’ के बीच की कडी हैं। वे भावनाओं में बहते नहीं, बल्कि उन्हें एक तटस्थता के साथ देखते हैं। वहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “साहित्य वह है जो मनुष्य को मनुष्यता की ओर ले जाए।” यह संग्रह इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

स्मृतियों का कोलाज और बचपन की ललक

कवि के यहां बीता हुआ समय ‘छूट’ गया है, पर ‘खत्म’ नहीं हुआ है। उनकी कविता ‘सीढियों से उतरती धूप’ बचपन की उन मासूम यादों को जीवंत करती है जो आज के यांत्रिक युग में कहीं गुम हो गई हैं। कवि लिखता है: “बचपन / आता तो है अभी भी / दस्तक देता है / करता है ठहर कर इंतजार भी / पर हम ही / दरवाजा नहीं खोलते”

यह पंक्तियां आधुनिक मनुष्य की उस विडंबना को रेखांकित करती हैं जहां हम भौतिकता की दौड में अपनी मौलिक सहजता खो चुके हैं। कवि की दृष्टि में बचपन कोई कालखंड नहीं, बल्कि एक चेतना है जिसे हमने अपने ही भीतर कैद कर रखा है।

महानगरीय त्रासदी और मानवीय संवेदना

संग्रह की कविताओं में शहर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक ‘आतंक का घेरा’ और ‘सन्नाटे का शहर’ बनकर उभरता है। ‘कवि की चिंता’ वैश्विक है। ‘तेरह साल की बच्ची’ जैसी कविता समाज के उस वीभत्स चेहरे को बेनकाब करती है जहां मासूमियत भय के साये में जीती है। इस कविता की अंतिम पंक्तियां रोंगटे खडे कर देने वाली हैं: “शायद वह आश्वस्त है / कि मुर्दों में / हरकतें नहीं होती हैं”

यहां कवि का ‘इंटेंशन’ (उद्देश्य) केवल दुख व्यक्त करना नहीं, बल्कि पाठक को उस सामाजिक जडता के प्रति झकझोरना है जहां जीवित मनुष्यों से ज्यादा भरोसा मुर्दों पर किया जाने लगा है। विदेशी आलोचक मैथ्यू अर्नोल्ड ने कविता को ‘जीवन की आलोचना’ कहा था; निखिलेश्वर जी की ये पंक्तियां इसी आलोचना का जीवंत प्रमाण हैं।

सत्ता, क्रांति और बाजार का शिकंजा :कवि सत्ता के चरित्र और बाजारवाद के बढते प्रभाव को बहुत बारीकी से समझता है। ‘सत्ता और क्रान्ति’ कविता में वे सत्ता के मुखौटों को उतारते हुए कहते हैं:

“सिलने की कोशिश होती है / उन्हीं जुबानों को / समर्थन में / जिनकी चीख सबसे मुखर होती है”।

यह राजनीतिक चेतना संग्रह को एक वैचारिक विस्तार देती है। साथ ही, ‘बाजार’ कविता में वे दिखाते हैं कि कैसे बाजार अब केवल गलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे शयन कक्ष तक घुस आया है और आदमी को ‘निचुडी हुई प्लास्टिक की बोतल’ की तरह फेंक देता है।

प्रकृति और प्रेम: एक संबल

जहां एक ओर युद्ध और आतंक की चिंता है, वहीं दूसरी ओर ‘नदी’, ‘धूप’ और ‘बारिश’ के माध्यम से कवि जीवन की निरंतरता का उत्सव भी मनाता है। ‘नदी’ उनके लिए प्रेम और संबल का प्रतीक है: “तुम्हारा नदी की तरह बहना / देता है संंबल”।

प्रेम यहां दैहिक आकर्षण मात्र नहीं, बल्कि ‘रूहों के पिघलने का सुख’ और ‘जिजीविषा’ है। ‘रजनीगंधा की महक’ में वे यादों के चिरस्थायी होने की बात करते हैं, जहाँ कवि के न रहने पर भी उसकी सुगंध शेष रहेगी।

आखिरी में सवाल महत्वपूर्ण है कि क्यों पढ़ी जाए यह काव्य संग्रह?

निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा की काव्य-कला की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरलता है। वे क्लिष्ट बिम्बों के जाल में पाठक को उलझाते नहीं, बल्कि सीधी बात कहते हैं। पॉल वैलेरी ने कहा था कि “कविता एक भाषा के भीतर दूसरी भाषा है।” इस संग्रह की भाषा वह है जो हृदय की धड़कनों को पढना जानती है।

कवि का मूल भाव ‘आशा’ है। जैसा कि शीर्षक ही संकेत देता है—’कोई राह बाहर निकलती है’। वे मानते हैं कि चाहे जंगल कितना भी घना क्यों न हो, एक रास्ता हमेशा बाहर की ओर जाता है। कवि के शब्दों में: “जब स्वयं से न लिख पाओ / पृष्ठ अपने जीवन का / तो जीवन को ही लिखने दो पृष्ठों को / आखिर घने से घने जंगल से भी / कोई राह बाहर निकलती तो है”।

यह संग्रह उन सभी के लिए है जो इस भागदौड़ भरी दुनिया में थोड़ी देर ठहरना चाहते हैं, अपनी स्मृतियों से मिलना चाहते हैं और यह विश्वास जगाना चाहते हैं कि अंधेरा चाहे जितना भी गहरा हो, ‘सुबह की धूप’ को मुट्ठी में भरा जा सकता है। निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा का यह प्रयास हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा को एक सार्थक विस्तार देता है।

समीक्षक : डॉ. संतोष पटेल

DISHA ROJHE

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