नई दिल्ली: पृथ्वी का बढ़ता तापमान आर्कटिक की बर्फ को पिघला रहा है, और इसके सबसे बड़े शिकार उत्तरी ध्रुवीय भालू बन रहे हैं। लेकिन प्रकृति की अद्भुत ताकत देखिए। ये भालू अब अपने डीएनए में बदलाव करके गर्म होती दुनिया में जीने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के वैज्ञानिकों की ताजा स्टडी से खुलासा हुआ है कि ग्रीनलैंड के दक्षिण-पूर्वी इलाके में रहने वाले भालुओं के जीन तेजी से अनुकूलित हो रहे हैं। इस रिसर्च में मुख्य भूमिका निभाई जंपिंग जीन ने, जो ट्रांसपोजॉन्स कहलाते हैं। ये छोटे जेनेटिक एलिमेंट्स जीनोम में इधर-उधर कूदते हैं और दूसरे जीनों की एक्टिविटी को कंट्रोल करते हैं।
दक्षिण-पूर्व ग्रीनलैंड के भालुओं में इनकी गतिविधि ज्यादा पाई गई, जबकि उत्तर में कम। यहां गर्मी और कम बर्फ के कारण शिकार मुश्किल है, इसलिए भालू फैट मेटाबॉलिज्म और हीट स्ट्रेस से जुड़े जीन बदल रहे हैं। शायद कम वसा वाले भोजन के लिए तैयार हो रहे हैं। स्टडी के लिए 17 भालुओं के ब्लड सैंपल लिए गए। आरएनए सीक्वेंसिंग से पता चला कि जंपिंग जीन कैसे काम कर रहे हैं। रिसर्च लीडर डॉ. एलिस गॉडेन के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व ग्रीनलैंड के भालुओं में जंपिंग जीन (ट्रांसपोजॉन्स) की एक्टिविटी काफी ज्यादा है। ये छोटे मोबाइल जीन तत्व पूरे जीनोम में घूमकर अन्य जीनों की ऑन-ऑफ स्विच को प्रभावित करते हैं। उत्तरी हिस्से के ठंडे और स्थिर मौसम वाले भालुओं की तुलना में दक्षिण में ये जीन ज्यादा सक्रिय हैं, जहां तापमान ज्यादा उतार-चढ़ाव वाला और गर्म है।
अब आर्कटिक की करीब 20 अलग भालू आबादियों का जीन विश्लेषण करेगी
‘मोबाइल डीएनए’ जर्नल में पब्लिश इस रिसर्च की लीड रिसर्चर कहती हैं, यह अनुकूलन की उम्मीद देता है, लेकिन पूरी प्रजाति खतरे में है। कार्बन एमिशन कम करना जरूरी है। अब टीम आर्कटिक की 20 उप-आबादियों का अध्ययन करेगी ताकि संरक्षण प्लान बेहतर बने। ध्रुवीय भालू आर्कटिक इकोसिस्टम के संकेतक हैं, उनकी लड़ाई हमारी भी है। अगर तापमान यूं ही बढ़ा, तो ये सफेद दैत्य गायब हो सकते हैं। टीम अब आर्कटिक की करीब 20 अलग-अलग भालू आबादियों का जीन विश्लेषण करेगी। इससे पता चलेगा कि कौन सी पॉपुलेशन ज्यादा रेजिलिएंट है और संरक्षण के लिए क्या रणनीति बनानी चाहिए। ध्रुवीय भालू आर्कटिक इकोसिस्टम के इंडिकेटर हैं। अगर वे अनुकूलित हो भी रहे हैं, तो भी पूरी प्रजाति खतरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिसर्च संरक्षण प्रयासों को नई दिशा देगी, लेकिन कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ा हल है। क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे



