नई दिल्ली: देशभर में सिंगल यूज प्लास्टिक को जड़ से खत्म करने के लिए सख्त कानून बने हुए हैं, लेकिन पंजाब के जालंधर में इनकी असलियत कुछ और ही बयान कर रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को सौंपी अपनी विस्तृत रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की है कि जालंधर में सिंगल यूज प्लास्टिक के उत्पादन, बिक्री और इस्तेमाल पर लगी रोक को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा। यह रिपोर्ट 495 पेजों की है और इसे 9 दिसंबर 2025 को दाखिल किया गया, जो एनजीटी के 25 अक्टूबर 2024 के निर्देश पर तैयार हुई थी।
दरअसल, यह पूरा मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें जालंधर के अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि वे सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में सुस्ती बरत रहे हैं। सीपीसीबी ने अपनी जांच में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) से रिपोर्ट मांगी, जिसके जवाब में पीपीसीबी ने 28 जनवरी 2025 को अपनी डिटेल शेयर की। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट (संशोधन) नियम 2021 और पंजाब प्लास्टिक कैरी बैग (नियंत्रण) अधिनियम 2005 (जिसमें 2016 में बदलाव हुए) के तहत सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूरी तरह पाबंदी है, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां बरकरार हैं।
जालंधर में क्या कार्रवाई हुई?
रिपोर्ट के अनुसार, जालंधर में प्लास्टिक बनाने वाली फैक्ट्रियों की लिस्ट तैयार की गई और नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना लगाया गया। दुकानों पर छापेमारी की गई, जहां प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त हुई। इसके साथ ही, स्थानीय लोगों और व्यापारियों को प्लास्टिक के पर्यावरणीय नुकसान के बारे में जागरूक करने के लिए कैंपेन चलाए जा रहे हैं। हालांकि, ये कदम कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं, इस पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि शिकायतें लगातार आ रही हैं।
सीपीसीबी के देशव्यापी प्रयास: एक नजर
सीपीसीबी ने रिपोर्ट में अपने बड़े स्तर के उपायों का भी जिक्र किया है। बोर्ड ने सिंगल यूज प्लास्टिक को खत्म करने के लिए एक रोडमैप तैयार किया है, जो तीन मुख्य हिस्सों में बंटा है: सप्लाई चेन पर कंट्रोल, मांग घटाने के तरीके और चरणबद्ध तरीके से प्लास्टिक को रिप्लेस करने का माहौल बनाना। इसका मकसद है कि पर्यावरण अनुकूल विकल्पों की तरफ शिफ्ट आसान हो।
कुछ प्रमुख कदम इस प्रकार हैं:
-राज्यों को निर्देश: 11 नवंबर 2024 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 5 के तहत सभी राज्य प्रदूषण बोर्डों को कंपोस्टेबल प्लास्टिक फैक्ट्रियों की जांच करने के आदेश दिए गए।
संयुक्त अभियान: हर महीने चार दिन राज्यों के शहरी विकास विभाग और प्रदूषण बोर्डों को जॉइंट इंस्पेक्शन चलाने को कहा गया। अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 तक यह अनिवार्य था।
-प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन: 4 जुलाई 2024 को स्थानीय निकायों से प्लास्टिक वेस्ट का आकलन कराने के निर्देश जारी हुए, ताकि सालाना रिपोर्टिंग सही हो।
एयरलाइन्स और ई-कॉमर्स पर शिकंजा: 17 फरवरी 2023 को 11 एयरलाइन कंपनियों को प्लास्टिक इस्तेमाल बंद करने को कहा गया। वहीं, 13 दिसंबर 2022 को 21 ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को प्रतिबंधित सामान स्टॉक न करने के ऑर्डर मिले।
-ट्रेसिंग और जांच: 17 मई 2024 को कई राज्यों को निर्देश दिए गए कि वे संपर्क ट्रेसिंग से अवैध उत्पादकों को पकड़ें।
कच्चे माल पर रोक: 13 दिसंबर 2022 को प्लास्टिक रॉ मटेरियल सप्लायर्स को बिना रजिस्ट्रेशन वाले उत्पादकों को सामान न देने के आदेश।
-मुख्य सचिवों को चिट्ठी: 12 अक्टूबर 2022 को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को प्रतिबंध लागू करने के लिए अधिकारियों को सक्रिय करने को कहा गया। -आयात पर बैन: 1 दिसंबर 2021 को कस्टम्स को प्रतिबंधित प्लास्टिक आयात रोकने के निर्देश।
ऑनलाइन पोर्टल: दो पोर्टल लॉन्च किए गए। एक निगरानी के लिए और दूसरा शिकायत दर्ज करने के लिए, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और तेज हो।
अमल में कमी के चलते पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा
यह रिपोर्ट न सिर्फ जालंधर की समस्या को उजागर करती है, बल्कि पूरे देश में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की चुनौतियों पर रोशनी डालती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून तो सख्त हैं, लेकिन अमल में कमी के चलते पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। क्या ये कदम पर्याप्त हैं या और सख्ती की जरूरत है? यह सवाल अब एनजीटी के सामने है, जहां आगे की सुनवाई होगी। अगर आप भी प्लास्टिक मुक्त भारत के पक्ष में हैं, तो स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलाएं और वैकल्पिक सामग्रियों का इस्तेमाल करें।



