नई दिल्ली: वाराणसी में आज से काशी तमिल संगमम् 4.0 की शुरुआत हो रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज नमो घाट से इस कार्यक्रम का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया।
इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आज सुबह काशी तमिल संगमम् की पहली विशेष ट्रेन 216 प्रतिनिधियों के साथ वाराणसी पहुंची थी। जिसमें 50 तमिल साहित्य विशेषज्ञ, 54 सांस्कृतिक विद्वान, छात्र, शिक्षक, कारीगर, शास्त्रीय संगीत कलाकार और आध्यात्मिक ग्रंथों के आचार्य और विद्यार्थी शामिल रहे।
लगभग 1400 प्रतिनिधि लेंगे भाग
इस बार केटीएस 4.0 के तहत तमिलनाडु से लगभग 1400 प्रतिनिधि उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का दौरा करेंगे। काशी में उनके लिए घाटों की सैर, मंदिरों का दर्शन, शैक्षणिक संस्थानों की यात्रा, स्थानीय लोगों से संवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों सहित कई गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।
तमिल महाकवि सुब्रह्मण्य भारती निवास का भी करेंगे दौरा
प्रतिनिधियों को काशी में मौजूद तमिल धरोहर स्थलों की भी सैर कराई जाएगी, जिनमें महाकवि सुब्रह्मण्य भारती का निवास, काशी मदम, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और माता अन्नपूर्णा मंदिर शामिल हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि सुब्रह्मण्य भारती लगभग 16 साल की उम्र में वाराणसी आए थे। वे यहाँ अपने मामा के घर रहे और काशी के शैक्षणिक व सांस्कृतिक वातावरण ने उनके विचारों को नई दिशा दी।
तमिल करकलाम है इस बार की थीम
इस बार संगमम् का विषय है चलो तमिल सीखें- तमिल करकलाम, जिसका उद्देश्य तमिल भाषा और संस्कृति को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाना और भारतीय भाषाओं की एकता को उजागर करना है। यह कार्यक्रम उत्तर-दक्षिण भारतीय संस्कृति के मेल-जोल को और मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है।
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काशी और तमिल संबंधों का इतिहास
एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, राजा पराक्रम पांड्य ने काशी की यात्रा से लौटते समय भगवान की इच्छा से एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसके कारण उस स्थान का नाम शिवकाशी पड़ा। पराक्रम पांड्य ने 15वीं शताब्दी में मदुरै क्षेत्र पर शासन किया और पांड्य राजाओं ने ही तेनकासी में काशी विश्वनाथर मंदिर बनवाया, जिसे दक्षिण भारत का “दक्षिण काशी” भी कहा जाता है। तमिलनाडु में काशी नाम से सैकड़ों शिव मंदिर मौजूद हैं, जो दोनों क्षेत्रों के धार्मिक संबंधों को और मजबूत करते हैं। बाद में, अधिवीर राम पांडियन ने 19वीं शताब्दी में तेनकासी में एक और शिव मंदिर का निर्माण कराया। तमिल संत कुमारा गुरुपारा ने भी काशी से प्रेरित होकर ‘काशी कलमबागम’ नामक व्याकरण-आधारित काव्य संग्रह की रचना भी की, जो काशी–कांची के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का साहित्यिक प्रमाण माना जाता है।




