नई दिल्ली: भारत मंडपम् में चल रहे 44वें भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में इस बार आदिवासी कला को खास जगह दी गई है। देश के 705 से ज्यादा आदिवासी समुदायों की अनूठी कला-संस्कृति को “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के थीम के साथ पेश किया जा रहा है। ये कलाकार रेशमी साड़ियां, प्राचीन चित्रकला, धातु की मूर्तियां और दर्पण-अल्पिक काम वाली पोशाकें दिखा रहे हैं।
तसर सिल्क की साड़ियां बना रहे गोंड समुदाय के सचिन
महाराष्ट्र के नागपुर के गोंड आदिवासी सचिन वाल्के अपनी परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही तसर सिल्क की साड़ियां लेकर आए हैं। कोकून इकट्ठा करना, धागा निकालना, बुनाई और फिर वारली व करवट प्रिंट करना, सब कुछ वे खुद करते हैं। सचिन कहते हैं, पहले ग्राहक ढूंढना मुश्किल था, लेकिन ट्राइफेड ने फरवरी के आदि महोत्सव और अब व्यापार मेले में स्टॉल लगवाया। अब अच्छी कमाई हो रही है।
गुजरात की 300 महिलाएं चमक रही हैं दर्पण काम से
गुजरात के बनासकांठा जिले की उगमबेन रामाभाई सुथार 300 महिलाओं के साथ मिलकर सूती और रेशमी कपड़ों पर अप्लिक व मिरर वर्क करती हैं। पहले सिर्फ गांव-बाजार तक सीमित थीं, लेकिन आदि महोत्सव और राज्य के मेलों में जाने से अब दिल्ली तक ग्राहक बन गए हैं। उनके रिश्तेदार प्रिंस कुमार लालजीभाई भिल खुश हैं कि अच्छी बिक्री और तारीफ दोनों मिल रही है।
झारखंड का पाइटकर चित्रकला को बचाने की जद्दोजहद
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के झांटू गोपे देश की सबसे पुरानी कथाचित्र कला “पाइटकर” को जिंदा रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं। प्राकृतिक रंगों से बने स्क्रॉल जैसे चित्रों में आदिवासी नृत्य, गीत और महाकाव्यों की कहानियां होती हैं। झांटू कहते हैं, अब बहुत कम परिवार ही यह कला कर रहे हैं। झारखंड कला मंदिर और राज्य सरकार की मदद से मेलों में स्टॉल लग पा रहा है।
मध्य प्रदेश के भारेवा समुदाय का स्क्रैप धातु का जादू
मध्य प्रदेश के बैतूल के विशाल बागमारी गोंड समुदाय के भारेवा सब-ट्राइब से हैं। पुराने लोहे-धातु के टुकड़ों से वे देवी-देवताओं की मूर्तियां, गहने और सजावटी सामान बनाते हैं। यह कला भी लुप्त होने की कगार पर है, लेकिन मेले में लोगों की तारीफ और खरीदारी से नई उम्मीद जगी है।
- ट्राइफेड कर रहा है तीन बड़े काम
- ट्रेनिंग और जागरूकता कार्यक्रम
- देश-विदेश में बाजार उपलब्ध कराना
- “ट्राइब्स इंडिया” ब्रांड बनाकर सम्मान और बिक्री बढ़ाना
भारत दुनिया का एकमात्र देश है जो चारों प्रमुख रेशम लबरी, तसर, एरी और मूगा पैदा करता है। इनमें से ज्यादातर आदिवासी इलाकों में ही बनते हैं।
2047 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में आदिवासी कला की भूमिका
सरकार का मानना है कि जब देश 2047 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगा, तब आदिवासी कला-हस्तशिल्प उसमें बड़ा योगदान देंगे। मेले जैसे मंच इन कलाकारों को न सिर्फ कमाई दे रहे हैं, बल्कि उनकी सदियों पुरानी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।



