अंटार्कटिका का ‘बर्फीला भूकंप’: हेक्टोरिया ग्लेशियर ने खोई आधी ऊंचाई

यह आधुनिक इतिहास की सबसे तेज ग्लेशियर गिरावट है, और इसका खुलासा 'नेचर जियोसाइंस' जर्नल में छपा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का 'रेड अलर्ट' बता रहे हैं, जो पूरे महाद्वीप के बर्फीले खजाने को खतरे में डाल सकता है।

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नई दिल्ली: सोचिए, अगर कोई विशाल बर्फ का पहाड़ रातोंरात आधा गायब हो जाए, बिना किसी चेतावनी के। यही तो हुआ है अंटार्कटिका के पूर्वी छोर पर बसे हेक्टोरिया ग्लेशियर के साथ। अमेरिका के कोलोराडो यूनिवर्सिटी बोल्डर के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च ने इस ‘बर्फीले सदमे’ को बेनकाब किया है। सिर्फ दो महीनों में इस ग्लेशियर ने अपनी लंबाई का करीब आधा हिस्सा यानी करीब 8 किलोमीटर बर्फ समुद्र की गोद में समर्पित कर दिया। यह आधुनिक इतिहास की सबसे तेज ग्लेशियर गिरावट है, और इसका खुलासा ‘नेचर जियोसाइंस’ जर्नल में छपा है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का ‘रेड अलर्ट’ बता रहे हैं, जो पूरे महाद्वीप के बर्फीले खजाने को खतरे में डाल सकता है।

क्या हुआ ऐसा? फ्लैट चट्टान और गर्म समुद्र का घातक गठजोड़

यह कोई साधारण पिघलाव नहीं था। हेक्टोरिया एक ‘टाइडवॉटर’ ग्लेशियर है, यानी इसका अगला सिरा समुद्र में डूबा हुआ है, और नीचे की चट्टानें समुद्र तल से भी नीचे हैं। लेकिन इसकी खासियत? नीचे की बेडरॉक लगभग बिल्कुल सपाट है, जैसे कोई बड़ा फर्श। ग्लोबल वॉर्मिंग ने बर्फ को पतला कर दिया, और अचानक ग्लेशियर का आगे का हिस्सा तैरने लगा। तैरते ही यह समुद्री लहरों और धाराओं का शिकार बन गया। वैज्ञानिकों की टीम ने इसे ‘सुपर कैल्विंग’ का नाम दिया, जब बर्फ के अंदर दरारें ऊपर-नीचे से फैलती हैं और एक झटके में पूरा टुकड़ा टूटकर गिर जाता है। 2023 की शुरुआत में यही हुआ: बर्फ ने रफ्तार पकड़ी, और फरवरी-मार्च के बीच 115 वर्ग मील बर्फ, जितना फिलाडेल्फिया शहर का इलाका समुद्र में विलीन हो गई। सामान्य दिनों में यह काम सालों लगता, लेकिन यहां तो महीनों का खेल था। उपग्रहों की हाई-रेज डेटा ने इस ‘फ्लैश क्रैश’ को कैद किया। अगर तस्वीरें तिमाही भर के गैप पर ली जातीं, तो शायद यह राज ही दफन हो जाता।

वैज्ञानिकों का ‘ओ माय गॉड’ मोमेंट: जमी हुई दुनिया का कच्चा चिट्ठा

टीम लीडर ने बताया कि 2024 में जब हम वहां पहुंचे, तो आंखें फटी की फटी रह गईं। उपग्रहों से जो संकेत मिले थे, वो तो कुछ थे, लेकिन हकीकत? वो तो कल्पना से परे था। सीआईआरईएस (कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायरनमेंटल साइंसेज) के एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह हेक्टोरिया की कहानी नहीं, बल्कि पूरे अंटार्कटिका की चेतावनी है। यहां फ्लैट-बेस वाले दर्जनों ग्लेशियर हैं, अगर वे भी ‘फ्लोट मोड’ में आ गए, तो समुद्र का स्तर रॉकेट स्पीड से चढ़ सकता है। एक दिन में 800 मीटर बर्फ टूटना है। यह आंकड़ा सुनकर वैज्ञानिकों के होश उड़ गए। वे अब ऐसे ‘वल्नरेबल’ ग्लेशियर्स की लिस्ट बना रहे हैं, ताकि निगरानी कड़ी हो सके।

समुद्र का ‘राइजिंग टाइड’: तटीय शहरों पर लटका तलवार

हेक्टोरिया खुद छोटा-मोटा है, लेकिन इसका ‘डोमिनो इफेक्ट’ डरावना है। अगर बाकी ग्लेशियर फॉलो करेंगे, तो ग्लोबल सी-लेवल में 25 किलोमीटर रिट्रीट का असर सालों तक महसूस होगा। न्यूयॉर्क, मुंबई, मालदीव जैसे इलाके डूबने की कगार पर आ सकते हैं। रिपोर्ट कहती है, 2022-23 के बीच कुल 25 किमी पीछे हटना है। यह सिर्फ शुरुआत हो सकती है। जलवायु विशेषज्ञ चेताते हैं कि यह पिघलाव तापमान का खेल नहीं, बल्कि बर्फ की स्थिरता का संकट है।”

आगे की राह: निगरानी और एक्शन का समय

यह स्टडी ध्रुवीय रिसर्च को नई दिशा दे रही है। वैज्ञानिक अब सैटेलाइट टेक्नॉलजी को और तेज कर रहे हैं, ताकि ऐसी ‘साइलेंट डिसास्टर्स’ पहले पकड़ी जा सकें। लेकिन सवाल वही है। क्या हम जलवायु परिवर्तन को रोक पाएंगे, या ये बर्फीले पहाड़ हमें ‘वेट एंड वेव्स’ से डुबो देंगे? हेक्टोरिया की यह कहानी हमें झकझोरती है। पृथ्वी चिल्ला रही है, अब हमारी बारी है सुनने की। अगर आप भी सोच रहे हैं कि क्या कर सकते हैं, तो शुरूआत कार्बन फुटप्रिंट कम करने से—क्योंकि हर डिग्री मायने रखती है।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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