थाली का छिपा खतरा: 30 हजार से ज्यादा प्रजातियां मिटने की कगार पर

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी तरीका ईजाद किया है, जो बताता है कि हमारा खाना बनाने का सिस्टम कितना बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।

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नई दिल्ली: हर रोज हम जो कुछ खाते हैं चाहे वो सुबह की कॉफी हो या रात का स्टेक ये सिर्फ हमारी भूख मिटाने का काम नहीं करता। ये फैसला धरती के लाखों जीवों की जिंदगी को भी प्रभावित करता है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी तरीका ईजाद किया है, जो बताता है कि हमारा खाना बनाने का सिस्टम कितना बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। उनके ताजा अध्ययन से साफ है। अगर खेती-बाड़ी के तौर-तरीके वैसे ही चले, तो अगले सौ सालों में 700 से 1,100 तक जानवरों की प्रजातियां हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं। और ये आंकड़े तो सिर्फ मौजूदा आबादी के हिसाब से हैं कि जनसंख्या बढ़ने पर ये संख्या आसमान छू सकती है।

‘लाइफ’ फॉर्मूला: खाने का पर्यावरण पर असर मापने का नया पैमाना

शोधकर्ताओं ने ‘लैंड इम्पैक्ट ऑन फ्यूचर एक्सटिंक्शन’ या ‘लाइफ’ नाम का ये नया टूल बनाया है। ये बताता है कि जंगल काटना, खेत बढ़ाना या फिर आवासों को वापस हरा-भरा करना ये सब कदम जीवों के बचे रहने की संभावना को कैसे बदल देते हैं। इसमें दुनिया भर के 30,875 जमीन पर रहने वाले कशेरुकी जीवों (जैसे गर्म रक्त वाले जानवर, परिंदे, सांप-छिपकलियां) के डेटा को जोड़ा गया है। अब वैज्ञानिक किसी भी खाने के एक किलो बनाने से जैव विविधता पर साल भर का नुकसान आसानी से आंक सकते हैं। ये तरीका नीतिनिर्माताओं के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

बीफ-मटन का जाल: कौन सा खाना सबसे घातक?

‘नेचर फूड’ जर्नल में छपी इस रिपोर्ट से पता चलता है कि गाय या भेड़ का मांस जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है। इन जानवरों को पालने में इतनी जमीन लगती है कि प्राकृतिक जंगल उजड़ जाते हैं, और सैकड़ों प्रजातियां बेघर हो जाती हैं। वहीं, दालें या राजमा जैसी सब्जी वाली चीजें तो बिल्कुल उलट हैं, ये रूमिनेंट मीट की तुलना में 150 गुना कम नुकसान पहुंचाती हैं। शोधकर्ता कहते हैं, एक किलो बीफ के लिए जितना प्लॉट चाहिए, उतने में अगर दालें उगाई जाएं तो पर्यावरण को राहत मिलेगी। ये सुनने में छोटी बात लगे, लेकिन असर गहरा है।

ट्रॉपिकल फूड का जाल: कॉफी-चाय से क्यों बढ़ रहा संकट?

हमारे किचन में रखी चीजें जैसे चाय, चॉकलेट, केला या कॉफी ये ज्यादातर गर्म इलाकों में उगती हैं, जहां जानवरों की विविधता सबसे ज्यादा है। यहां खेती फैलाने से खतरा दोगुना हो जाता है। ठंडे इलाकों की फसलें तो अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। ब्रिटेन का उदाहरण लें: वहां का 90 फीसदी जैव विविधता का नुकसान आयातित खाने से होता है। ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड का बीफ लोकल ब्रिटिश मीट से 30-40 गुना ज्यादा घातक साबित हो रहा है। ब्रेक्जिट के बाद आयात बढ़ा तो ब्रिटेन का ‘विलुप्ति का कार्बन फुटप्रिंट’ भी चढ़ गया। ये चेतावनी हर देश के लिए है कि हमारी थाली वैश्विक संकट को हवा दे रही है।

नीतियां बदलें, थाली साफ करें

कैम्ब्रिज टीम ने स्टॉकहोम इंस्टीट्यूट और जेएनसीसी के साथ मिलकर ये ‘लाइफ’ टूल ब्रिटिश सरकार की पॉलिसी में डाल दिया है। अब वो फैसला ले सकते हैं कि कौन सा ट्रेड डील या फूड पॉलिसी धरती को कितना नुकसान पहुंचाएगी। शोध कहता है: सिर्फ लोकल खेती पर फोकस न करें, क्योंकि आयात से कहीं और जंगल कट रहे होंगे। पिछले 60 सालों में धरती का एक तिहाई हिस्सा खेती में तब्दील हो चुका कि ये विलुप्ति का नंबर वन कारण है।

क्या करें हम? एक थाली से शुरू करें बदलाव

अध्ययन की कुंजी ये है: मांस कम, दालें ज्यादा ब्रिटेन जैसे देश अपना नुकसान आधा कर सकते हैं। हर कौर के साथ हम किसी जीव की कहानी जोड़ रहे हैं। तो अगली बार बाजार जाएं तो सोचें: लोकल, टिकाऊ और प्लांट-बेस्ड चॉइस चुनें। ये छोटा कदम आने वाली नस्लों को हरी धरती सौंप सकता है। क्या आप तैयार हैं अपनी थाली को पर्यावरण का दोस्त बनाने के लिए?

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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