पटना: बिहार में जमींदारों और भूमिहीनों के संघर्ष का इतिहास पुराना है। इसमें 80 का वो दशक भी आया, जिसमें जमीदारों का घर से निकलना मुश्किल था। कहां उनकी लाश मिल जाए, उसको कोई नहीं जान पाता था। जमीन एक की, फसल भी उसकी, लेकिन झंडा किसी और ने लगा दिया। इसके बाद काटना और उसे ले जाने उसका पूरा फायदा उठाने का हक भी उसी का हो जाता था। जिसकी खेती, उसकी हिम्मत भी नहीं पड़ती थी कि वह उस तरफ नजर भी उठा ले। अगर गलती की तो उसकी जान जानी भी तय थी।
इसमें इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) लीड ले रहा था। यह संगठन बाद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यानि भाकपा-माले के नाम से उभरा। बोलचाल में इसे माले कहा गया। इसके तेवर शुरू से जुझारू थे। माले ने भोजपुर, जहानाबाद समेत नजदीकी जिलों के गरीब, दलित-पिछड़ों के बीच गहरी पैठ बना ली थी। ताकत इनको भूमिहीनों और निचली जातियों से मिलती थी। इनका इतना आतंक था कि लाल झंडा देख पूरा क्षेत्र दहल उठता था। इसकी प्रतिक्रिया में शुरुआत से ही जमीदारों ने भी अपनी निजी सेनाएं बनाई, लेकिन वह देर तक नहीं टिक सकीं।
माले से रक्षा के लिए बने कई जातीय संगठन
माले से खुद को सुरक्षित रखने के नाम पर 80 के दशक में कुर्मी समाज ने भूमि सेना थी। इसका कार्य क्षेत्र पटना, नालंदा, जहानाबाद और गया था। वहीं, राजपूतों ने 1970 और 1980 के दशक में कुएर सेना बनायी गयी थी। इसके अधिकांश सदस्य राजपूत समाज के युवा थे। इस तरह कई क्षेत्रीय आधार पर बनी सामाजिक सेनाएं बंदूक लेकर एक दूसरे की हत्या अपने समाज की रक्षा के नाम पर करती थीं। लेकिन यह कुछ समय तक ही अस्तित्व में रहीं। स्थाई सिर्फ माले था, जिसकी क्रूर अराजकता साल दर साल बढ़ती गयी। इसमें एक स्थिति वह भी आई, जब लोगों की चोटी काट दी जाती, चोटी देखकर हत्या कर दी जाती थी।
ब्रह्मेश्वर मुखिया बनाम आईपीएफ की जंग
नब्बे के दशक में लाल आतंक भोजपुर के खोपिरा गांव के ब्रह्मेश्वर मुखिया तक पहुंचा। उस वक्त खेती-किसानी के काम के लिए भी मजदूर नहीं मिलते थे। एक बार ऐसा हुआ कि जब धान की रोपाई के लिए उनके खेत में मजदूर नहीं आये तो बाहर के लोगों को लाकर उन्होंने इसका इंतजाम किया। जानकारी मिलने पर आईपीएफ का हथियार बंद दस्ता काम रोकने के लिए पहुंच गया। ब्रह्मेश्वर मुखिया पहले से ही इसके लिए तैयार थे। दोनों तरफ से हिंसक झड़प हुई। इसमें आईपीएफ के दो लोग मारे गये और ब्रह्मेश्वर के भी कई लोग घायल हुए। इसके बाद ब्रह्मेश्वर आईपीएफ के हिट लिस्ट में आ गये।
महिला विधायक को निर्वस्त्र करने की कोशिश
इसी बीच भोजपुर में एक घटना घटी। 1992 में भोजपुर के नाढ़ी गांव में कांग्रेस की विधायक ज्योति देवी एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंची थीं। माले कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला कर दिया और निर्वस्त्र करने की कोशिश की। वह किसी तरह जान बचाकर भागी और नजदीक के एक घर में जा छिपीं। माले कार्यकर्ता उस घर पर जा धमके। लेकिन घर के मालिक चंद्रिका राय बीच में ढाल बनकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि यदि महिला विधायक को मारने से पहले उनकी लाश से गुजरना पड़ेगा।
पूरा वाकया दिन-दहाड़े घटा था। इससे माले कार्यकर्ता वापस लौट गए, लेकिन उन लोगों ने बदला लेने की ठान ली थी। कुछ दिन बाद उनको इसका मौका भी मिल गया। हुआ यह कि एक दिन चंद्रिका राय शौच के लिए बाहर जा रहे थे। रास्ते में माले कार्यकर्ताओं ने उनको घेर लिया। चंद्रिका राय अकेले थे। बचने का कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने विरोध किया, लेकिन वह बच नहीं सके। माले के लोगों ने उनकी गला रेत कर हत्या दी। इसके बाद भी माले कार्यकर्ता वापस नहीं लौटे। तीन दिन तक शव को घेर कर रखा। पुलिस भी शव को उठाने के लिए माओवादियों के सामने गिड़गिड़ाती रही। किसी तरह उस व्यक्ति की सड़ी-गली लाश मिली। इसके बाद भूमिहारों ने तय किया कि यदि एकजुट न हुए तो अस्तित्व नहीं बचेगा। इस घटना की वजह से आगे की रणनीति बनने लगी।
जब भूमिहारों का बारा गांव आया नक्सलियों की हिटलिस्ट में
महिला विधायक को बचाने वाले चंद्रिका राय की हत्या के बाद अभी बैठकों का दौर चल ही रहा था कि गया जिले के बारा गांव में भी माओवादियों ने 12 फरवरी 1992 को ऊंची जाति के 35 लोगों की गला रेत कर हत्या कर दी। इस नरसंहार के पीछे के इतिहास को देखें तो गया जिले के टेकारी ब्लाक मुख्यालय के तीन किमी दूर बरसिंहा गांव है, जहां 1991 में सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने दस दलितों को मार डाला था। इस हत्या के बाद टेकारी ब्लाक का ही बारा गांव नक्सलियों के हिटलिस्ट में था। बारा लगभग 50 भूमिहारों का एक गांव था।
लाश भी सड़ती रही लोगों की
नक्सलियों को यह पता था कि सवर्ण लिबरेशन फ्रंट का मुखिया रामाधीन सिंह आता-जाता रहता है। रामाधीन के आने की जानकारी के आधार पर 12 फरवरी 1992 को लगभग हथियार बंद पांच सौ नक्सलियों ने गांव को घेर लिया। उनकी तैयारी थी कि रामाधीन सिंह को जिंदा पकड़कर ले जाया जाय। कई नक्सली पुलिस की वर्दी भी पहनकर आये थे। उन्होंने हर घर को भरोसे में लिया कि वे बस तलाशी लेने आये हैं, लेकिन रामाधीन सिंह नहीं मिले। तनाव के इस दौर में इसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी। इसमें नक्सलियों ने घरों से पुरुषों के हाथ-पांव बांधकर नहर किनारे ले गये और वहां हत्या कर दी। सुबह जब पुलिस पहुंची तो वहां सिर्फ लाशें मिली। सभी की गर्दन रेत कर हत्या की गयी थी।
भूमिहारों के लिए रहा यह बड़ा नरसंहार
बारा का नरसंहार कोई पहला नरसंहार नहीं था, लेकिन भूमिहारों के लिए बड़ा नरसंहार जरूर था। टारगेट किलिंग भूमिहारों के लिए अलार्म था। अब भूमिहारों के साथ ही सवर्णों को ऐसा लगने लगा था कि यदि एकजुट नहीं हुए तो बचना मुश्किल है। संकट अस्तित्व पर आ पड़ा दिख रहा था। इस घटना के बाद पूरे राज्य में संगठित होने की योजना बनने लगी। योजना बनी कि सभी छोटे-छोटे संगठनों को समाहित कर एक संगठन हो। यह तय हुआ कि यह पूरा प्रदेश स्तरीय संगठन रहे। इसकी अगुवाई करने में प्रमुख नाम था ब्रह्मेश्वर मुखिया। वही ब्रह्मेश्वर मुखिया, जो खुद के दम पर माओवादियों से लोहा ले चुके थे। इसको संगठित करने और अर्थ की व्यवस्था का भी जिम्मा ब्रह्मेश्वर मुखिया के जिम्मे था।
बेलाउर में नक्सलियों ने लिख दिया नारा
यह भी आश्चर्य होगा कि यह सेना पहले बनी थी और नामकरण बाद में हुआ। तब भोजपुर में गंगा सेना और क्षत्रिय क्रांतिकारी मंच नाम की दो सेनाएं हुआ करती थीं। बैठकों में सारे सवर्णों को संयुक्त होने की बात कही गयी थी। राजपूतों ने भी भूमिहारों से हाथ मिला लिया। इसी बीच आईपीएफ ने भूमिहार बहुल बेलाउर गांव में एक नारा लिख दिया। नारा था, ध्वस्त किया बिहटा और इक वारी, अबकी बार बेलाउर की बारी। बिहटा पहले से ही संघर्ष का जड़ रहा था। अब नक्सलियों की नजर बेलाउर पर थी। अभी सवर्ण और ब्रह्मेश्वर मुखिया के बीच अभी बैठक चल ही रही थी कि एक आदमी आकर बताया कि बेलाउर को नक्सलियों ने घेर लिया है। इसी बीच सबने बेलाउर चलने का निर्णय ले लिया।
बेलाउर में ही पांच जनवरी को रणवीर सेना का हुआ नामकरण
मान्यता थी कि बेलाउर में एक देवता का निवास है। इनको सब रणवीर बाबा कहते हैं। उनके यहां जाने का रास्ता दलितों के टोले से होकर था। दलितों के टोले से रणवीर बाबा के समाधि तक जाने से रोक दिया था। जब नक्सलियों के द्वारा घेरने की सूचना मिली तो ब्रह्मेश्वर मुखिया अपने दल-बल के साथ बेलाउर पहुंचे और वहां बेलाउर के लोगों के साथ मिलकर दस दिनों तक नक्सलियों का मुकाबला किया। इसमें मगध व शाहाबाद के भूमिहारों के साथ ही क्षत्रियों ने भूमिहारों का साथ दिया और नक्सलियों को भगाने में कामयाब हुए।
बेलाउर में नक्सलियों को भगाने में भूमिहारों को मिली थी पहली सफलता
यह नक्सलियों के खिलाफ भूमिहारों की पहली सफलता थी। नक्सलियों के जाने के बाद वहीं एक बैठक हुई और इसके नामकरण का फैसला किया गया। कई नाम सामने आए, लेकिन सहमति नहीं बन पा रही थी। इसी बीच एक युवक ने सलाह दी कि इसका नाम रणवीर बाबा के नाम पर रख दिया जाय। इस पर सब सहमत हो गए। इस तरह से पांच जनवरी 1995 को रणवीर सेना अस्तित्व में आयी, जब इसके नाम की घोषणा की गयी।
- नोट: अगले अंक में रणवीर सेना और उसके विस्तार पर चर्चा होगी



