नई दिल्ली: रेगिस्तान की रेत पर सूरज की किरणें चमक रही हैं, और हवा में घोड़ों की टापों की गूंज मिश्रित हो रही है लोक संगीत की धुनों से। राजस्थान का पुष्कर मेला, जो सदियों से ऊंटों के विशाल कारवां का गवाह रहा, आज एक नई कहानी सुना रहा है। 30 अक्टूबर से 5 नवंबर तक चलने वाला यह 2025 का मेला अब सिर्फ पशु बाजार नहीं, बल्कि संस्कृति का जीवंत कैनवास बन चुका है। पर्यटक दूर-दूर से आकर यहां राजस्थानी हस्तशिल्प, नाच-गाना और आध्यात्मिक ऊर्जा में डूब रहे हैं, लेकिन मेले की आत्मा ऊंट अब पीछे छूटती नजर आ रही है।
पुरानी यादें, नई हवा
कभी ये मेला ऊंटों, बैलों और घोड़ों की खरीद-फरोख्त का केंद्र था। रेगिस्तानी व्यापारी महीनों की यात्रा कर यहां पहुंचते, जहां व्यापार के साथ भक्ति और दोस्ती का मेला लगता। लेकिन आधुनिकता की लहर ने चेहरा मोड़ दिया। अब मेला लोक कलाओं, हथकरघा बाजारों और सांस्कृतिक शोज का त्योहार है। विदेशी सैलानी कैमरों में कैद कर रहे हैं ये रंग, जबकि स्थानीय कलाकार अपनी धरती की कहानियां गा रहे हैं।
घोड़ों का राज, ऊंटों की खामोशी
इस बार का ट्विस्ट बड़ा है, घोड़ों ने मैदान मार लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 4,000 घोड़े मेले में सज-धज कर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि ऊंटों का आंकड़ा महज 1,400 पर सिमट गया। घोड़ों के घेरे में चहल-पहल है। मारवाड़ी और काठियावाड़ी नस्लों की नीलामी, उनकी चमचमाती सजावट और सवारी शोज दर्शकों को बांधे रखे हुए। व्यापारी इन्हें शादियों, खेलों या टूरिज्म के लिए तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ, ऊंटों के छोटे-छोटे बाड़े सूने से लगते हैं, जैसे पुरानी यादें धुंधली हो रही हों।
ऊंटों की गिरती सीढ़ियां: आंकड़ों की सच्चाई
रेगिस्तान का ये ‘जहाज’ अब डूबता नजर आ रहा। भारत में 1961 के दशक में ऊंटों की तादाद 10 लाख के पार थी, जो आज महज दो लाख पर आ गई। राजस्थान, जहां 90 फीसदी ऊंट पलते हैं, की हालत और खराब है। 2007 में 4.2 लाख ऊंट थे, 2012 तक 3.25 लाख, और 2019 में 2.1 लाख से ऊपर नहीं पहुंचे – यानी सात सालों में 35% की डुबकी। हाल ही में 2025 में राज्य ने इंटरस्टेट ट्रांसपोर्ट बैन हटा लिया, लेकिन नुकसान हो चुका।
क्यों ये सिलसिला रुका नहीं?
मुख्य वजह 2015 का राजस्थान कैमल एक्ट, जो ऊंटों को बचाने के चक्कर में ट्रेड पर ब्रेक लगा बैठा। मगर इससे पालक परेशान बिना बाजार के ऊंट बेकार हो गए। ऊपर से ट्रैक्टर-जीपों ने ऊंटगाड़ियों को किनारे कर दिया, चरागाह सिकुड़ गए, मौसम की मार पड़ी और कमाई का स्रोत सूखा। नतीजा? थार के इलाकों में ऊंटों के झुंड अब कहानी बनते जा रहे।
घोड़ों की चमक क्यों बढ़ी?
जब ऊंट पीछे छूटे, तो घोड़े आगे आए। इनकी नस्लें न सिर्फ खूबसूरत हैं, बल्कि व्यावहारिक भी प्रदर्शन, सवारी या इवेंट्स के लिए परफेक्ट। पुष्कर में उनकी नीलामी अब स्टेज का सितारा है, जो मेले को नई ऊर्जा दे रही। पर्यटन बूम ने भी इन्हें बूस्ट दिया कि सैलानी घुड़सवारी एक्सपीरियंस के लिए लाइन लगा रहे।
दुनिया में ऊंटों का उगना, भारत में ढलना
ये विडंबना है कि भारत में ऊंट लुप्त हो रहे, वहीं ग्लोबली उनकी तादाद 1960 के 1.3 करोड़ से उछलकर 3.5 करोड़ पार हो गई। FAO की रिपोर्ट्स कहती हैं कि अफ्रीका-एशिया में ये दूध, मांस और ट्रांसपोर्ट के लिए स्टार बन रहे। 2024 को FAO ने ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ कैमेलिड्स’ घोषित किया, ताकि इनकी वैल्यू और प्रोटेक्शन पर फोकस हो। भारत को भी सबक लेना होगा। कंसर्वेशन के नाम पर लाइवलीहुड न कुर्बान हो।
समय की लहर पर सवार मेला
पुष्कर आज भी राजस्थान की धड़कन है। घोड़ों की दौड़, गीतों की बरसात और तीर्थयात्रियों की भक्ति से भरा। लेकिन ऊंटों की कमी दिल को छू जाती है, जैसे पुरानी दोस्ती का दर्द। सूर्यास्त के वक्त रेत पर लंबी परछाइयां गिरती हैं, जो याद दिलाती हैं कि बदलाव आता है, मगर जड़ें गहरी रहती हैं। क्या ये मेला ऊंटों को वापस लाएगा? आने वाले साल जवाब देंगे।



