पटना: आज से प्रथम चरण के चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरु हो गयी है। इस बीच चर्चा है कि तेजस्वी यादव दो जगह से चुनाव लड़ेंगे। एक अपनी पुरानी सीट राघोपुर और दूसरा जननायक कर्पूरी ठाकुर की कर्मभूमि फुलपरास से लड़ने की चर्चा है। अब यह निर्णय प्रशांत के राघोपुर से चुनाव लड़ने की अटकलों के कारण लिया गया है या दलित वर्ग में जननायक कर्पूरी ठाकुर के करीबी व उनके सपनों को साकार करने की चाहत दिखाने के लिए लिया जा रहा है, यह तो आने वाला समय बताएगा। इस बीच तेजस्वी के एक बयान में अपने पिता लालू प्रसाद यादव की कर्पूरी ठाकुर की नजदीकी बताकर दलित वर्ग को लुभाने की जरूर कोशिश की है।
हालांकि चुनाव में कब क्या हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता। राघोपुर सीट से भी एक बार राबड़ी देवी हार चुकी हैं, जबकि राजद के लिए वह सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है। वहीं इस बार कभी प्रशांत तो कभी तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप भी राघोपुर में जाकर तेजस्वी की धड़कने बढ़ा रहे हैं। ऐसे में यदि तेजस्वी को राघोपुर में उलझना पड़ा तो उनकी पार्टी को ज्यादा नुकसान हो सकता है। दूसरी तरफ कर्पूरी ठाकुर के क्षेत्र में जाकर वे अति पिछड़ा वर्ग को कर्पूरी ठाकुर को स्वयं का आदर्श बताकर उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकते हैं।
प्रशांत व तेज की नजर लगी है राघोपुर पर
इस बार प्रशांत की नजर भी राघोपुर पर है। हालांकि वे लड़ेंगे या नहीं, इस पर भी अभी उहापोह की स्थिति है। उन्होंने अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं। इस बीच तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप भी राघोपुर में अपनी कई सभाएं कर चुके हैं। इससे यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि अपनी एक सेफ सीट के लिए तेजस्वी ने कर्पूरी ठाकुर की कर्मभूमि का चयन किया है। इससे वे निफिक्र होकर चुनाव प्रचार में अपना पूरा समय दूसरी सीटों पर दे सकते हैं।
राजद में इकलौता बड़ा नेता होने के कारण एक सीट पर उलझना दिक्कत की बात
यह भी तय है कि राजद के इकलौता बड़ा नेता और लोगों में पकड़ के कारण तेजस्वी को हर सीट पर जाना होगा। उनके दौरे और तेज करने होंगे, यदि वे अपनी सीट पर उलझ गये तो फिर राजद को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस कारण राजद तेजस्वी को दो जगहों से लड़ाने का फैसला कर रही है।
दो सीट पर लड़ने से होंगे दो फायदे
यदि यह निर्णय जमीनी धरातल पर उतरता है तो इससे राजद को दो फायदे होंगे। एक तो तेजस्वी कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श बताकर दलित वर्ग में अपनी पैठ बढ़ा सकते हैं, दूसरा वे निफिक्र होकर अपने उम्मीदवारों का प्रचार करने में सफल हो सकते हैं। अब क्या होगा, यह तो भविष्य की गर्त में है, लेकिन अभी जो सामने है, उससे स्पष्ट है कि राजद एक तीर से दो निशाने लगाने की फिराक में है।
राघोपुर मानी जाती है पारंपरिक सीट, पिछली बार मिला था पचास प्रतिशत वोट
राघोपुर की सीट लालू प्रसाद की पारिवारिक परंपरागत सीट मानी जाती है। पिछली बार का रिजल्ट देखें तो तेजस्वी यादव को 97404 वोट मिले थे, जो कुल पड़े मत का 49.85 प्रतिशत था। यह मत जादुई आंकड़े के नजदीक है। वहीं दूसरे नंबर पर भाजपा के सतीश कुमार यादव रहे, जिन्होंने 59230 मत के साथ कुल पड़े मत का 30.31 प्रतिशत प्राप्त किया था। वहीं चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी के राकेश रौशन को 24947 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 12.77 प्रतिशत था। इस बार एलजेपी एनडीए के साथ है। यदि चिराग अपना वोट भाजपा को दिलवाने में सफल हो जाते हैं तो इससे तेजस्वी की चुनावी नाव अधजल में फंस सकती है। यह डर भी राजद को सता रहा होगा।
सतीश ने हराया था राबड़ी देवी को
इससे पहले 2015 में तेजस्वी को कुल 49.15 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि भाजपा के सतीश कुमार यादव को 36.9 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। सपा से राकेश रौशन ने पर्चा दाखिला किया था और उन्हें भी 2.81 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। एक बार सतीश यादव 2010 के चुनाव में राघोपुर से जदयू से चुनाव लड़कर राबड़ी देवी को हरा भी चुके हैं। उस समय सतीश कुमार यादव को 64, 222 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 48.06 प्रतिशत रहा, जबकि राजद की राबड़ी देवी को 51,216 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 38.32 प्रतिशत रहा।
मंगनीलाल के सहारे अतिपिछड़ा वर्ग में सेंधमारी की तैयारी
यह भी चर्चा है कि तेजस्वी फुलपरास से लड़कर अतिपिछड़ा वर्ग में सेंध मारने का प्रयास करेंगे। इसी के दृष्टिगत राजद ने प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल को बनाया है, जो धानुक समाज से आते हैं। राजद उनके सहारे अतिपिछड़ा वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है। अभी फुलपरास में जदयू से विधायक मंत्री शीला मंडल अति पिछड़ा में धानुक समाज से हैं।
धानुक समाज में दो फाड़ करने में सफल होगी राजद
यदि धानुक समाज का भी देखें तो इसमें दो हिस्सा है, एक मगहिया और दूसरा चिरौद। मंगनी लाल चिरौद से हैं, जबकि शीला मगहिया से हैं और इसी का फायदा उठाकर राजद धानुक समाज के एक हिस्से को अपने पाले में करना चाहती है। अगर ऐसा होता है तो फुलपरास से कांग्रेस को अपना दावा छोड़ कर कहीं और फोकस करना होगा। राजद के अलावा कांग्रेस और जदयू के बड़े नेताओं भी यह चर्चा तेज है कि तेजस्वी फुलपरास सीट से लड़ सकते हैं।
फुलपरास से चुनाव लड़कर होगी मिथिला में पकड़ मजबूत करने की कोशिश
सुपौल से लेकर दरभंगा तक 25 सीटों में राजद के पास मात्र तीन सीटें लौकहा, मधुबनी और मनिगाछी है। तेजस्वी यादव पहले से इस बात को कहते रहे हैं कि मिथिला क्षेत्र में राजद को मजबूत करके सत्ता के करीब पहुंचा जा सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तेजस्वी यादव फुलपरास से चुनाव लड़ने पर इसका प्रभाव दरभंगा और सुपौल तक की सीटों पर पड़ेगा। फुलपरास विधानसभा क्षेत्र में यादव उम्मीदवारों को लगातार दबदबा रहा है। 1990 से लेकर 2015 तक इस सीट से यादव उम्मीदवार को ही जीत मिली थी, जिसमें तीन बार देवनाथ यादव और दो बार उनकी पत्नी गुलजार देवी को जीत मिली थी। शीला मंडल ने पहली बार यहां से जीत दर्ज की और उन्होंने मंत्रीमंडल में जगह बना ली। 1977 के उपचुनाव में देवेंद्र प्रसाद यादव ने सीट छोड़ी थी और मुख्यमंत्री रहते हुए जननायक कर्पूरी ठाकुर को जीत मिली थी। तब से इस सीट को जननायक की कर्मभूमि के तौर पर भी देखा जाता है।



